UP News: बहुजन समाज पार्टी (BSP) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश के चार मेडिकल कॉलेजों में SC वर्ग के लिए अतिरिक्त आरक्षण पर हाईकोर्ट की रोक के बाद योगी सरकार से सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सहारनपुर, अंबेडकरनगर, कन्नौज और जालौन के मेडिकल कॉलेज स्पेशल कंपोनेंट प्लान के तहत बनाए गए हैं। ऐसे में एससी वर्ग के लिए अतिरिक्त आरक्षण को 50% के सामान्य आरक्षण से अलग माना जाना चाहिए था।
मायावती ने कहा कि यदि राज्य सरकार ने कोर्ट में इस पक्ष की पुरजोर पैरवी की होती कि स्पेशल कंपोनेंट प्लान के धन का इस्तेमाल एससी समाज के हित और कल्याण के लिए किया गया है और अतिरिक्त आरक्षण उसी उद्देश्य की पूर्ति करता है, तो कोर्ट इस पर सकारात्मक विचार कर सकता था।
सुप्रीम कोर्ट में तुरंत सरकार को अपील करना चाहिए
बसपा सुप्रीमो ने कहा कि अब हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था पर रोक लगा दी है और इसका असर मेडिकल दाखिले पर भी पड़ रहा है। ऐसे में यूपी सरकार को तत्काल सुप्रीम कोर्ट में अपेक्षित राहत के लिए अपील करनी चाहिए। हाईकोर्ट ने 17 सितंबर को चारों मेडिकल कॉलेजों में करीब 91% आरक्षण की व्यवस्था पर रोक लगाते हुए सामान्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लागू आरक्षण के आधार पर काउंसिलिंग जारी रखने की अनुमति दी थी।
ये है पूरा मामला, जिस पर मायावती हुईं हमलावर
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों अम्बेडकरनगर, कन्नौज, सहारनपुर व जालौन में नीट-यूजी दाखिलों के लिए लागू करीब 91% आरक्षण व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगा दी है।
कोर्ट ने काउंसलिंग पूरी तरह रोकने के बजाय अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों की तरह 21% एससी (SC), 2% एसटी (ST) और 27% ओबीसी (OBC) आरक्षण के आधार पर काउंसलिंग प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति दी है। इन चार कॉलेजों में विशेष घटक योजना के तहत आरक्षण का दायरा बढ़ाकर लगभग 91% (एससी को करीब 73%) कर दिया गया।
UPI शुल्क पर भी सरकार को घेरा
मायावती ने UPI डिजिटल लेनदेन पर 15 अक्टूबर से लागू होने वाली शुल्क व्यवस्था को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पहले सरकार ने UPI और डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा दिया और अब उसी लेनदेन पर शुल्क वसूलने की नई व्यवस्था की जा रही है।
उनके मुताबिक, इस व्यवस्था को चाहे जिस नाम से पुकारा जाए, इसका अतिरिक्त आर्थिक बोझ अंततः आम जनता की जेब पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि देश की बड़ी आबादी पहले ही गरीबी और महंगाई से परेशान है। बच्चों के सामने शिक्षा, रोजगार और अन्य समस्याएं हैं। ऐसे में सरकार की नीतियां लाभ कमाने वाली व्यावसायिक व्यवस्था की बजाय कल्याणकारी होनी चाहिए।
स्मार्ट स्कूल से पहले बुनियादी सुविधाएं पूरी हों
पूर्व सीएम ने यूपी सरकार की 14,429 परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों को स्मार्ट स्कूल के रूप में विकसित करने की योजना पर भी सवाल उठाए। सरकार ने इसके लिए करीब 300 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। योजना के तहत प्रत्येक स्कूल में स्मार्ट क्लास और डिजिटल सुविधाएं विकसित की जानी हैं। प्रति स्कूल करीब 2.07 लाख रुपए का खर्च निर्धारित है।
उन्होंने कहा कि स्मार्ट पढ़ाई से पहले बच्चों के लिए स्कूल की बुनियादी जरूरतें पूरी करना जरूरी है। स्कूलों में छत, बेंच-कुर्सी, किताबें, शौचालय, खेल का मैदान और साफ-सफाई जैसी सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि करीब दो लाख रुपए प्रति स्कूल की राशि में क्या इन बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। सरकार को इस पर भी गंभीरता और सहानुभूति से विचार करना चाहिए।
