
Hind Decoder Special News: आज जब कोई दलित-बहुजन समुदाय का व्यक्ति किसी से मिलता है, तो “जय भीम” कहकर अभिवादन करता है। यह महज दो शब्द नहीं हैं— यह एक विचारधारा है, एक संघर्ष है, एक आत्मसम्मान की घोषणा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह नारा पहली बार किसने, कब और किन परिस्थितियों में दिया था?

— नारे के जनक
“जय भीम” का श्रेय बाबू हरदास एल.एन. को जाता है। वे डॉ. भीमराव अंबेडकर के परम विश्वासपात्र सहयोगियों में से एक थे और सेंट्रल प्रोविंस बरार परिषद के विधायक भी रहे। राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय होने के साथ-साथ वे अंबेडकरवादी आंदोलन के एक समर्पित सिपाही भी थे। 6 जनवरी 1935 की तारीख इस नारे के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। नागपुर (महाराष्ट्र) के समीप आयोजित एक सभा में बाबू हरदास ने पहली बार “जय भीम” का उद्घोष किया। यह सभा समता सैनिक दल के कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित की गई थी — वही संगठन जो डॉ. अंबेडकर के आंदोलन का एक मजबूत स्तंभ था।
बाबू हरदास की सोच बिल्कुल स्पष्ट थी। उन्होंने महसूस किया कि जिस तरह “वंदे मातरम्” और “जय हिंद” राष्ट्रीय आंदोलन की पहचान बन चुके थे, उसी तरह अंबेडकरवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं के बीच भी एकता और पहचान के लिए एक साझा अभिवादन होना चाहिए — एक ऐसा नारा जो बराबरी, न्याय और स्वाभिमान का प्रतीक हो।
‘बल भीम’ का प्रस्ताव और ‘जय भीम’ की विजय
दिलचस्प बात यह है कि बाबू हरदास ने शुरू में यह प्रस्ताव रखा था कि जब कोई “*जय भीम” कहे, तो सामने वाला “बल भीम” कहकर उत्तर दे— ठीक वैसे ही जैसे “जय हिंद” के जवाब में “जय हिंद” कहा जाता है। लेकिन जन-आंदोलन की अपनी भाषा होती है। धीरे-धीरे “जय भीम” ही एकल और पूर्ण अभिवादन के रूप में स्थापित हो गया। “बल भीम” पृष्ठभूमि में चला गया और “जय भीम” करोड़ों लोगों के होठों पर चढ़ गया। 1938 में एक ऐतिहासिक क्षण आया जब पहली बार स्वयं डॉ. भीमराव अंबेडकर की उपस्थिति में सार्वजनिक रूप से यह नारा बुलंद किया गया। उस सभा में जब हजारों कंठों से “जय भीम” की गूँज उठी, तो यह नारा केवल एक अभिवादन नहीं रहा— यह एक आंदोलन की आत्मा बन गया।
इतिहास में दर्ज साक्ष्य
इस तथ्य को ऐतिहासिक आधार भी प्राप्त है। रामचंद्र क्षीरसागर की प्रसिद्ध पुस्तक ‘Dalit Movement in India and Its Leaders’ में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि “जय भीम” नारे के जनक बाबू हरदास एल.एन. ही थे। यह पुस्तक दलित आंदोलन के इतिहास का एक प्रामाणिक दस्तावेज मानी जाती है। नौ दशकों से अधिक समय बीत चुका है। आज “जय भीम” केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के किसी भी कोने में — अमेरिका हो, इंग्लैंड हो, ऑस्ट्रेलिया हो या दक्षिण-पूर्व एशिया— जहाँ भी अंबेडकरवादी विचारधारा के अनुयायी मिलते हैं, “जय भीम” से ही अभिवादन होता है। यह नारा आज सामाजिक न्याय, समता, बंधुता और मानवीय गरिमा का सार्वभौमिक प्रतीक बन चुका है। यह उन लाखों-करोड़ों लोगों की आवाज़ है जो सदियों के अपमान को पीछे छोड़कर एक नए, समतामूलक समाज की ओर बढ़ रहे हैं।
दो शब्द — लेकिन इनमें समाया है एक पूरा आंदोलन, एक पूरा इतिहास, एक पूरी उम्मीद।
जय भीम।

