Entertainment Desk: तेलुगु सिनेमा के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि किसी महिला-प्रधान फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया है, और यह उपलब्धि काफी हद तक सामंथा रुथ प्रभु की दमदार वापसी की देन है। ‘माँ इंति बंगारम’ एक्शन, पारिवारिक भावनाओं और एक सशक्त महिला किरदार की कहानी को जोड़ने की कोशिश करती है। निर्देशिका नंदिनी रेड्डी ने पारंपरिक पारिवारिक ताने-बाने में एक्शन का पुट देने का प्रयास किया है, हालांकि यह प्रयोग हर जगह उतना असरदार नहीं बन पाया। फिल्म की कहानी 1990 के दशक में सेट है। सुवर्णा (सामंथा रुथ प्रभु), एक अनाथ युवती, डॉक्टर अनिरुद्ध (दिगंत) से विवाह करती है। अनिरुद्ध का परिवार इस विवाह से नाखुश है, क्योंकि यह उनकी सहमति के बिना हुआ था।
तीन वर्ष बाद अनिरुद्ध अपनी बहन के विवाह-समारोह के सिलसिले में सुवर्णा को अपने पैतृक गांव ‘बल्लावरम’ लेकर आता है। सुवर्णा का एकमात्र उद्देश्य है—किसी भी तरह अपने ससुराल वालों का दिल जीतना। लेकिन गांव में कदम रखते ही उसका रहस्यमयी अतीत उसका पीछा करने लगता है। जेल में बंद एक खूंखार अपराधी करुणा (गुलशन देवैया) को सुवर्णा की असली पहचान का पता चल जाता है। आखिर सुवर्णा का अतीत क्या है, और उसे ‘झाँसी’ के नाम से क्यों जाना जाता है—फिल्म की कहानी इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट सामंथा का दमदार अभिनय है। कार-चेज़ और बस-फाइट जैसे एक्शन दृश्य, साथ ही बैकग्राउंड स्कोर, प्रभावशाली बन पड़े हैं।
लेकिन कहानी के स्तर पर फिल्म कई जगह लड़खड़ाती भी है। पटकथा जाने-पहचाने ट्विस्ट्स पर ही टिकी रह जाती है, हास्य वाले हिस्से असमान लगते हैं, और भावनात्मक दृश्य वह गहराई नहीं पकड़ पाते जिसकी उम्मीद की जाती है। पहले हिस्से की रफ्तार भी ढीली पड़ जाती है, जिससे फिल्म की समग्र पकड़ कमजोर होती है। कुल मिलाकर, सामंथा और गुलशन देवैया के अभिनय तथा एक्शन सीक्वेंस के दम पर यह एक बार देखी जा सकने वाली फिल्म तो बनती है, लेकिन लेखन के स्तर पर यह अपनी पूरी संभावना का इस्तेमाल नहीं कर पाती।
