Special News: तो हुआ यूं कि एक स्टार्टअप फाउंडर की कंपनी बिकी। पूरे 500 करोड़ रुपये में। भारत सरकार को टैक्स में मिला जीरो। शून्य। एक रुपया नहीं। भाई, यह जुगाड़ नहीं, यह पूरी तरह लीगल है। कैसे, वो आज पूरा समझेंगे, और साथ में वो सारे मुश्किल शब्द भी तोड़ेंगे जो अक्सर ऐसी खबरों में आते हैं और समझ नहीं आते। अंग्रेज़ी की रिपोर्ट्स में जो शब्द बार-बार आता है, वो है “मिलियनेयर”। हिंदी में इसका सीधा तर्जुमा है करोड़पति, पर असल मायने में यह उससे भी बड़ी बात है। ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट्स में मिलियनेयर उसे कहा जाता है जिसके पास कम से कम 10 लाख डॉलर, यानी आज के भाव में करीब साढ़े नौ करोड़ रुपये की निवेश योग्य संपत्ति हो, यानी घर-ज़मीन छोड़कर सिर्फ शेयर, कैश, बॉन्ड जैसी चीज़ें।
फाइनेंस इंडस्ट्री में इसके लिए दो शब्द चलते हैं, HNI यानी हाई नेट वर्थ इंडिविजुअल, और उससे भी ऊपर वाले को कहते हैं UHNI या UHNWI, यानी अल्ट्रा हाई नेट वर्थ इंडिविजुअल, वो लोग जिनके पास कम से कम 3 करोड़ डॉलर (करीब 287 करोड़ रुपये) से ज़्यादा की दौलत हो। भारत के इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में इनके लिए कोई अलग “मिलियनेयर” कैटेगरी नहीं है, वहां सीधा-सादा शब्द चलता है, “एक करोड़ से ज़्यादा सालाना आय वाले टैक्सपेयर्स”, यही असल में आम बोलचाल का “करोड़पति” है।
अब नंबर देखिए, दिल थोड़ा भारी होगा
हेनले एंड पार्टनर्स नाम की एक इंटरनेशनल कंसल्टेंसी है, जो हर साल हिसाब रखती है कि कौन सा देश कितने मिलियनेयर्स खो रहा है और कौन सा पा रहा है। भारत का रिकॉर्ड देखिए, 2022 में 7,500 मिलियनेयर्स गए, 2023 में 6,500, और 2025 की रिपोर्ट कहती है इस साल करीब 3,500 और जाएंगे। यानी रफ्तार कम हुई है, पर बहाव अभी थमा नहीं। इसे रुपयों में समझें तो 3,500 लोग यानी कम से कम 33,000 करोड़ रुपये की दौलत, और यह सिर्फ न्यूनतम आंकड़ा है। कोटक बैंक के एक सर्वे की मानें तो भारत के हर पांच में से एक अल्ट्रा-रिच व्यक्ति (UHNI) या तो विदेश जा चुका है या जाने की तैयारी में है, वो भी भारतीय नागरिकता बनाए रखते हुए। नाइट फ्रैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में करीब 85,698 लोग ऐसे हैं जिनके पास एक करोड़ डॉलर, यानी करीब 83 करोड़ रुपये से ज़्यादा की संपत्ति है।
और यही आंकड़ा 2028 तक बढ़कर करीब 4.3 लाख अल्ट्रा-HNI तक पहुंचने का अनुमान है, जिनकी कुल दौलत होगी करीब 359 लाख करोड़ रुपये। अब यह मत सोचिए कि सब दुबई ही भाग रहे हैं। 2025 में यूएई को सबसे ज़्यादा 9,800 मिलियनेयर्स मिले, पर उसके पीछे अमेरिका (7,500), इटली (2,200), स्विट्ज़रलैंड (1,500), सऊदी अरब (2,400, पिछले साल से आठ गुना ज़्यादा) और सिंगापुर, पुर्तगाल जैसे देश भी लिस्ट में हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन टॉप दस में से नौ देशों में बाकायदा “निवेश करो, रेजिडेंसी पाओ” वाला सिस्टम है, यानी पैसा लगाओ और वीज़ा पाओ।
अब समझिए NRI, और उसका मतलब क्या होता है
भारत के इनकम टैक्स कानून की धारा 6 में एक सीधा नियम है, अगर आप एक वित्तीय वर्ष में भारत में 182 दिन से कम रहते हैं, तो आप “नॉन-रेजिडेंट” यानी NRI बन जाते हैं। NRI का मतलब सिर्फ “विदेश में रहने वाला भारतीय” नहीं है, टैक्स के लिहाज़ से इसका मतलब है कि अब आपकी विदेश में हुई कमाई पर भारत सरकार का कोई हक नहीं रहता। 2020 में सरकार ने एक नया नियम जोड़ा, धारा 6(1A), जिसे “डीम्ड रेजिडेंट” यानी “मान लिया गया निवासी” वाला नियम कहते हैं। मतलब अगर कोई भारतीय नागरिक दुनिया में कहीं भी टैक्स नहीं भर रहा, यानी पूरी तरह “स्टेटलेस” घूम रहा है, और भारत से उसकी कमाई 15 लाख रुपये से ज़्यादा है, तो उसे भारत में ही टैक्स रेजिडेंट मान लिया जाएगा।
यह नियम खासतौर पर उन लोगों को पकड़ने के लिए लाया गया जो किसी भी देश की टैक्स व्यवस्था में दर्ज नहीं होते। पर यहीं ट्विस्ट है। यूएई में टैक्स भले शून्य हो, पर वहां एक बाकायदा टैक्स रेजिडेंसी सर्टिफिकेट मिलता है। जो फाउंडर विधिवत यूएई का रेजिडेंट बन जाता है, वो “कहीं टैक्स नहीं भर रहा” वाली कैटेगरी में आता ही नहीं, इसलिए भारत का यह 2020 वाला नियम उसे छू नहीं पाता। एक लूपहोल बंद करने की कोशिश हुई, और लूपहोल के अंदर एक और लूपहोल निकल आया।
अब टैक्स के मुश्किल शब्द आसान भाषा में
कैपिटल गेन का मतलब है, कोई एसेट, जैसे शेयर या प्रॉपर्टी, खरीदने और बेचने के बीच जो मुनाफा हुआ, उस पर लगने वाला टैक्स। अगर एसेट दो साल से ज़्यादा (अनलिस्टेड शेयरों के मामले में) रखने के बाद बेची जाए, तो उसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) कहते हैं, और इस पर टैक्स की दर कम होती है, कम समय में बेचने वाले (शॉर्ट टर्म) से। सरचार्ज का मतलब है, टैक्स के ऊपर लगने वाला एक अतिरिक्त टैक्स, जो सिर्फ ज़्यादा कमाई करने वालों पर लगता है, जैसे टैक्स पर टैक्स। सेस का मतलब है, सरकार एक खास मकसद (जैसे शिक्षा या स्वास्थ्य) के लिए टैक्स पर अलग से थोड़ी रकम और जोड़ लेती है। इंडेक्सेशन का मतलब है, महंगाई के हिसाब से खरीद कीमत को बढ़ाकर दिखाना, ताकि मुनाफा कम दिखे और टैक्स कम लगे। 2024 के बजट के बाद ज़्यादातर मामलों में यह सुविधा हटा दी गई है। टैक्स आर्बिट्राज का मतलब है, दो अलग-अलग देशों के टैक्स नियमों के फर्क का फायदा उठाना, वो भी पूरी तरह कानूनी तरीके से। यह टैक्स चोरी नहीं है, चोरी तब होती है जब कानून तोड़ा जाए, यहां कोई कानून नहीं टूटता, बस दोनों देशों के नियमों की तुलना करके ज़्यादा फायदे वाला रास्ता चुना जाता है।
गोल्डन वीज़ा का मतलब है, किसी देश में एक तय रकम निवेश करने पर मिलने वाला लंबी अवधि का रहने का परमिट, जो नौकरी या स्पॉन्सर पर निर्भर नहीं करता। एग्ज़िट टैक्स का मतलब है, कोई व्यक्ति जब किसी देश की नागरिकता या टैक्स रेजिडेंसी छोड़ता है, तो उस पर एक आखिरी टैक्स लगाया जाता है, जैसे मानो उसने अपनी सारी संपत्ति उसी दिन बेच दी हो। अमेरिका ऐसा टैक्स अपनी नागरिकता छोड़ने वालों पर लगाता है, भारत में फिलहाल ऐसा कोई नियम नहीं है। ईसॉप का मतलब है, कंपनी अपने कर्मचारियों को सैलरी के अलावा कंपनी के शेयर देती है, ताकि वो भी कंपनी की ग्रोथ में हिस्सेदार बनें। एंजल इन्वेस्टमेंट और सीड राउंड का मतलब है, किसी नए स्टार्टअप को शुरुआती दौर में लगाया जाने वाला पैसा, अक्सर व्यक्तिगत निवेशकों की तरफ से, इससे पहले कि बड़े वेंचर कैपिटल फंड्स आएं।
अब गणित, 500 करोड़ वाला
जुलाई 2024 के बजट के बाद अनलिस्टेड कंपनी के शेयरों पर LTCG दर है 12.5%, बिना इंडेक्सेशन के। इस पर सरचार्ज अधिकतम 15% (2022 में ही इसे 37% से घटाकर 15% किया गया था), और 4% सेस अलग से। मिलाकर असरदार दर बनती है करीब 14.95%। 500 करोड़ के एग्ज़िट पर यह बनता है करीब 74-75 करोड़ रुपये, यानी डॉलर में करीब 77 लाख डॉलर। यही रकम अगर फाउंडर 182 दिन का नियम पूरा करके यूएई से एग्ज़िट करे, तो शून्य हो जाती है। तुलना के लिए, भारत में हाई इनकम पर सामान्य टैक्स और सरचार्ज मिलाकर असरदार दर 39% से 42% तक पहुंचती है। दुबई में यह शून्य। यही फासला है जो हर साल हज़ारों करोड़ रुपये यहां से वहां धकेल रहा है।
भारत का क्या जा रहा है, दुबई का क्या आ रहा है
जो फाउंडर जाता है, वो अपने साथ ले जाता है भविष्य का एंजल इन्वेस्टमेंट, अगली पीढ़ी के स्टार्टअप्स में लगने वाला पैसा, ईसॉप की वैल्यू, आने वाले सीड राउंड्स। एक इंसान नहीं जाता, एक पूरी चेन खिसकती है। उधर दुबई को मिलता है रियल एस्टेट बूम (गोल्डन वीज़ा की शर्त के चलते), वेल्थ मैनेजमेंट इंडस्ट्री में उछाल, और एक नया अमीर कंज़्यूमर बेस। क्योंकि यह टैक्स चोरी नहीं, टैक्स आर्बिट्राज है, इसे रोकने के लिए घरेलू कानून काफी नहीं होता। अगर सरकार सख्ती करे, जैसे एक्ज़िट टैक्स लगाए, तो डर है और लोग जल्दबाज़ी में भाग सकते हैं। इसीलिए सरकार ने बैन का नहीं, मुकाबले का रास्ता चुना है, गुजरात के गिफ्ट सिटी को भारत के भीतर ही एक “मिनी दुबई” बनाने की कोशिश हो रही है, जहां 10 साल तक मुनाफे पर टैक्स छूट जैसी सुविधाएं मिलती हैं। फिलहाल मुकाबला बराबरी का नहीं है। एक तरफ शून्य टैक्स वाला दुबई, दूसरी तरफ 40% के करीब पहुंचती दरों वाला भारत। जब तक यह फासला बना रहेगा, यह कहानी बार-बार दोहराई जाती रहेगी।
