Special: बारिश बर्बाद, बोरवेल सूखे— दो भाई-बहन ने वो कर दिखाया जो सरकारें नहीं कर पाईं

Special: बारिश बर्बाद, बोरवेल सूखे— दो भाई-बहन ने वो कर दिखाया जो सरकारें नहीं कर पाईं

Special Story: हर साल मानसून आता है, शहर डूबते हैं, और फिर मई आते-आते वही शहर पानी के लिए तरसते हैं। बेंगलुरु इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है — एक तरफ बाढ़, दूसरी तरफ बोरवेल 1,500 फीट तक खुदे फिर भी खाली। इस विरोधाभास का जवाब किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि एक 17 और एक 20 साल के भाई-बहन की सोच से आया है।

पेटेंट क्या है, काम कैसे करता है?

वेरुस्का पांडे (17) और वेदांश पांडे (20) को भारत का पहला ऐसा पेटेंट मिला है जो स्टॉर्मवॉटर ड्रेन्स के जरिए भूजल रिचार्ज की तकनीक पर आधारित है। तकनीक सरल है, लेकिन सोच गहरी — स्टॉर्मवॉटर ड्रेन के भीतर ओपन वेल्स बनाए जाते हैं जिनमें प्रिसिजन ड्रिल्ड रिंग्स और स्लोटेड GI पाइप लगे होते हैं। बारिश का पानी सड़क पर बहने की बजाय इन्हीं संरचनाओं से होते हुए सीधे जमीन में उतरता है — प्राकृतिक रूप से फिल्टर होकर। अलग से जमीन नहीं चाहिए, अलग से बजट नहीं चाहिए। दूसरा पेटेंट— “सॉलिड सेग्रिगेशन ग्रिल” — नालों में ठोस कचरे को पहले ही रोक देता है ताकि पानी साफ बहे और रिचार्ज सिस्टम बंद न हो।

Special: बारिश बर्बाद, बोरवेल सूखे— दो भाई-बहन ने वो कर दिखाया जो सरकारें नहीं कर पाईं

असली सवाल यह है

भारत के शहरों में हर साल करोड़ों लीटर बारिश का पानी नालों से होते हुए समुद्र में चला जाता है। NITI Aayog चेतावनी दे चुका है कि 2030 तक 21 बड़े शहरों का भूजल खत्म हो सकता है। स्मार्ट सिटी मिशन पर हजारों करोड़ खर्च हो चुके हैं — लेकिन शहरी जल प्रबंधन आज भी वहीं खड़ा है। दो युवाओं ने बिना किसी सरकारी फंड के वो मॉडल बना दिया जिसे हर नगर निगम को अनिवार्य रूप से अपनाना चाहिए।

वेरुस्का और वेदांश सिर्फ innovators नहीं हैं

वेरुस्का WHO Youth Ambassador हैं, NCDs पर शोध प्रकाशित कर चुकी हैं और Project Suryanayak के जरिए हजारों लोगों को CPR प्रशिक्षण दे चुकी हैं। वेदांश पर्यावरण इंजीनियरिंग के छात्र हैं और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े हैं। यानी ये वो पीढ़ी है जो समस्या देखती है, समाधान बनाती है — और सिस्टम का इंतजार नहीं करती। सवाल सिर्फ इतना है — क्या हमारी नगर निगमें और नीति-निर्माता इस तकनीक को अपनाने की इच्छाशक्ति दिखाएंगे? या अगले मानसून में फिर वही तस्वीरें आएंगी — डूबती सड़कें और सूखे बोरवेल।

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