World Occupational Day: जानें इसका इतिहास, नकली Therapists से रहे सावधान

World Occupational Day: जानें इसका इतिहास, नकली Therapists से रहे सावधान

World Occupational Day 2025: आज पूरी दुनिया में विश्व व्यावसायिक उपचार दिवस (World Occupational Day) मनाया जा रहा है। यह दिन उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण लेकर आता है जो किसी शारीरिक या मानसिक समस्या के कारण अपने रोजमर्रा के काम नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन इस मौके पर एक गंभीर सवाल भी उठ रहा है कि क्या जो लोग खुद को ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट बता रहे हैं, वे सच में योग्य हैं या फिर मरीजों के साथ धोखाधड़ी हो रही है।

व्यावसायिक उपचार (Occupational Therapy) की शुरुआत कैसे हुई

ऑक्यूपेशनल थेरेपी यानी व्यावसायिक उपचार की नींव अठारहवीं सदी में रखी गई थी, लेकिन इसे एक पेशे के रूप में पहचान प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान मिली। सन 1914 से 1918 के बीच जब युद्ध में हजारों सैनिक घायल हो रहे थे, तब डॉक्टरों ने महसूस किया कि सिर्फ दवाई और ऑपरेशन से काम नहीं चलेगा। घायल सैनिकों को फिर से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौटने के लिए खास तरह की ट्रेनिंग की जरूरत थी। इसी जरूरत ने व्यावसायिक उपचार को जन्म दिया। सन 1917 में अमेरिका में पहली बार नेशनल सोसाइटी फॉर द प्रमोशन ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपी की स्थापना हुई, जो आज अमेरिकन ऑक्यूपेशनल थेरेपी एसोसिएशन के नाम से जानी जाती है। इसके बाद 1952 में वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट्स बना, जिसने इस चिकित्सा पद्धति को वैश्विक पहचान दिलाई। भारत में इसकी शुरुआत 1965 में हुई जब पहला ऑक्यूपेशनल थेरेपी कोर्स शुरू किया गया।

डॉक्टर विलियम रश डंटन जूनियर को व्यावसायिक उपचार का जनक माना जाता है। वे एक अमेरिकी मनोचिकित्सक थे जिन्होंने 1915 में सबसे पहले इस थेरेपी के सिद्धांत और तरीके तय किए। भारत में इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने वालों में डॉक्टर मैरी वर्गीज का नाम सबसे पहले आता है, जिन्होंने 1950 के दशक में भारत में पहली बार ऑक्यूपेशनल थेरेपी की प्रैक्टिस शुरू की। वेल्लूर का क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज भारत का पहला संस्थान था जहां यह कोर्स शुरू हुआ।

Best Occupational Therapy center in Kerala, India

आखिर क्या है यह व्यावसायिक उपचार (What is Occupational Therapy)

बहुत से लोग यह नहीं जानते कि ऑक्यूपेशनल थेरेपी असल में है क्या। आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसा इलाज है जो किसी व्यक्ति को उसकी रोजमर्रा की जिंदगी फिर से जीना सिखाता है। जब कोई बच्चा, बड़ा या बुजुर्ग किसी बीमारी, चोट या जन्मजात समस्या के कारण अपने रोजाना के काम नहीं कर पाता, तो ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट उसे धीरे-धीरे वे सभी काम करना सिखाता है। यह सिर्फ शारीरिक इलाज नहीं है, बल्कि मन, शरीर और समाज तीनों का संतुलित पुनर्वास है।

मसलन, अगर किसी बच्चे को ऑटिज्म है और वह पेंसिल नहीं पकड़ पाता, कपड़े नहीं पहन पाता या दूसरे बच्चों के साथ नहीं खेल पाता, तो ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट उसे खेल-खेल में ये सब सिखाता है। इसी तरह अगर किसी बुजुर्ग को लकवा मार गया है और वह चम्मच से खाना नहीं खा पाता या बाथरूम नहीं जा पाता, तो थेरेपिस्ट उसे फिर से ये काम करने लायक बनाता है। यह थेरेपी व्यक्ति को सिर्फ ठीक नहीं करती, बल्कि उसे आत्मनिर्भर बनाती है ताकि वह दूसरों पर बोझ न बने।

योग्यता का सवाल सबसे जरूरी | World Occupational Day 2025

अब यहां आता है सबसे महत्वपूर्ण सवाल कि आखिर ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट बनने के लिए क्या योग्यता चाहिए। भारत में रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया यानी आरसीआई ने इसके लिए साफ नियम बनाए हैं। ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट बनने के लिए बैचलर ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपी यानी बीओटी की डिग्री जरूरी है। यह साढ़े चार साल का कोर्स होता है जिसमें चार साल पढ़ाई और छह महीने की इंटर्नशिप होती है। इस कोर्स में दाखिले के लिए बारहवीं कक्षा में साइंस स्ट्रीम से फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी के साथ कम से कम पचास फीसदी अंक होने चाहिए।

बीओटी के बाद जो लोग और पढ़ना चाहते हैं, वे मास्टर ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपी यानी एमओटी कर सकते हैं, जो दो साल का कोर्स है। कुछ लोग रिसर्च के लिए पीएचडी भी करते हैं। लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि बिना बीओटी की डिग्री के कोई भी व्यक्ति ऑक्यूपेशनल थेरेपी नहीं कर सकता। यहां तक कि अगर किसी ने स्पेशल एजुकेशन में बीएड या एमएड किया है, या क्लिनिकल साइकोलॉजी में डिप्लोमा किया है, या स्पीच थेरेपी में डीएचएलएस किया है, तो भी वह ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट नहीं बन सकता। ये सभी अलग-अलग क्षेत्र हैं और हर क्षेत्र के लिए अलग योग्यता चाहिए।

भारत के प्रमुख संस्थान जहां मिलता है असली प्रशिक्षण | World Occupational Day

भारत में कुछ सरकारी और प्राइवेट संस्थान हैं जो ऑक्यूपेशनल थेरेपी में डिग्री देते हैं। इनमें सबसे पुराना और प्रतिष्ठित है मुंबई का ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन, जो 1955 से यह कोर्स चला रहा है। चेन्नई में नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एम्पावरमेंट ऑफ पर्सन्स विद मल्टीपल डिसेबिलिटीज भी बहुत अच्छा संस्थान है। बेंगलुरु का निमहंस यानी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज खासकर मानसिक स्वास्थ्य में विशेषज्ञता रखता है।

वेल्लूर का क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, मुंबई का सेठ जीएस मेडिकल कॉलेज और केईएम हॉस्पिटल, नई दिल्ली का एम्स, मुंबई का टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज, मणिपाल का मणिपाल कॉलेज ऑफ हेल्थ प्रोफेशन्स और मैसूर का जेएसएस कॉलेज ऑफ फिजियोथेरेपी भी अच्छे सरकारी संस्थान हैं। प्राइवेट सेक्टर में पुणे का डॉक्टर डीवाई पाटिल यूनिवर्सिटी, पुणे की सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, नवी मुंबई का एमजीएम इंस्टीट्यूट और चेन्नई की श्री रामचंद्र यूनिवर्सिटी प्रमुख हैं। देश में कुल मिलाकर चालीस से पैंतालीस कॉलेज हैं जो यह कोर्स कराते हैं।

विदेशों में भी कई बड़े संस्थान हैं जहां से लोग यह डिग्री लेते हैं। अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया, बोस्टन यूनिवर्सिटी, वाशिंगटन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग बहुत मशहूर हैं। ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड ब्रूक्स यूनिवर्सिटी, कार्डिफ यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन का नाम आता है। ऑस्ट्रेलिया में यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड, कर्टिन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी प्रमुख हैं। कनाडा में यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो, मैकमास्टर यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया से लोग यह कोर्स करते हैं।

Zep Rehabilitation Centre

पुनर्वास में थेरेपी की भूमिका | World Occupational Day

व्यावसायिक उपचार पुनर्वास की रीढ़ है। जब किसी को स्ट्रोक हो जाता है यानी लकवा मार जाता है, तो उसके हाथ-पैर काम करना बंद कर देते हैं। ऐसे में ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट उसे धीरे-धीरे हाथ-पैर हिलाना सिखाता है, चम्मच पकड़ना सिखाता है, बटन लगाना सिखाता है। अगर किसी की हड्डी टूट गई है या कोई एक्सीडेंट हो गया है, तो उसे जोड़ों को फिर से मूव करना सिखाया जाता है। अगर किसी को रीढ़ की हड्डी में चोट लग गई है और वह व्हीलचेयर पर है, तो उसे व्हीलचेयर चलाना और उसमें बैठकर अपने सब काम करना सिखाया जाता है।

बच्चों के लिए यह थेरेपी बहुत खास है। जिन बच्चों को सेरेब्रल पाल्सी होती है, यानी दिमाग की नस में खराबी के कारण बच्चे की मांसपेशियां कमजोर या अकड़ी हुई होती हैं, उन्हें मोटर स्किल्स सिखाई जाती हैं। ऑटिज्म के बच्चों को सोशल स्किल्स यानी दूसरों के साथ घुलना-मिलना सिखाया जाता है। जिन बच्चों का विकास देर से हो रहा है, उन्हें उनकी उम्र के हिसाब से सब काम करना सिखाया जाता है। लर्निंग डिसेबिलिटी वाले बच्चों को स्कूल के लिए तैयार किया जाता है ताकि वे क्लास में बैठ सकें, लिख सकें, पढ़ सकें।

बुजुर्गों के लिए भी यह थेरेपी बहुत काम की है। जिन बुजुर्गों को भूलने की बीमारी यानी डिमेंशिया है, उनके लिए याददाश्त बढ़ाने की एक्सरसाइज की जाती है। जिन्हें जोड़ों में दर्द यानी आर्थराइटिस है, उन्हें जोड़ों को बचाकर काम करने के तरीके सिखाए जाते हैं। गिरने से बचने के लिए संतुलन बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है। मानसिक रोगों में भी यह थेरेपी काम आती है। डिप्रेशन में मरीज को रोजाना की रूटीन बनाने में मदद की जाती है। एंग्जायटी में रिलैक्सेशन के तरीके सिखाए जाते हैं। जो लोग बीमारी या चोट के बाद दोबारा नौकरी पर जाना चाहते हैं, उन्हें जॉब ट्रेनिंग दी जाती है और ऑफिस में कैसे काम करना है, यह सिखाया जाता है।

थेरेपी की अपनी सीमाएं भी हैं | World Occupational Day

हर इलाज की तरह व्यावसायिक उपचार की भी कुछ सीमाएं हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि इसमें नतीजे तुरंत नहीं मिलते। कम से कम तीन से छह महीने की नियमित थेरेपी करनी पड़ती है तब जाकर कुछ सुधार दिखता है। कुछ मामलों में तो साल भर या उससे भी ज्यादा समय लग जाता है। दूसरी बात यह है कि अगर मरीज या बच्चा को-ऑपरेट नहीं करता, यानी साथ नहीं देता, तो कोई फायदा नहीं होता। थेरेपिस्ट जो होम प्रोग्राम देता है, यानी घर पर करने के लिए एक्सरसाइज, वह अगर नहीं की जाएं तो प्रगति नहीं होती।

कुछ बहुत गंभीर मामलों में जैसे कि बहुत ज्यादा ब्रेन डैमेज हो गया हो, तो इस थेरेपी से भी सीमित सफलता मिलती है। ऐसी बीमारियां जो बढ़ती जाती हैं जैसे कि कुछ तरह के न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर, उनमें थेरेपी से पूरा ठीक नहीं किया जा सकता, सिर्फ मैनेज किया जा सकता है। यह इलाज काफी महंगा भी है। प्राइवेट सेंटर में एक सेशन का पांच सौ से दो हजार रुपए तक खर्च आता है और यह थेरेपी महीनों चलती है, तो कुल मिलाकर बहुत खर्च हो जाता है। भारत में योग्य थेरेपिस्टों की भी बहुत कमी है। पूरे देश में सिर्फ दस से बारह हजार रजिस्टर्ड ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट हैं, जो एक सौ तीस करोड़ की आबादी के लिए बहुत कम है।

कभी-कभी सिर्फ ऑक्यूपेशनल थेरेपी काफी नहीं होती। साथ में फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी या दूसरे इलाज भी चाहिए होते हैं। कई मामलों में दवाई और सर्जरी के साथ ही यह थेरेपी दी जाती है तभी असर होता है। इसलिए मरीजों और माता-पिता को यह समझना जरूरी है कि ऑक्यूपेशनल थेरेपी कोई जादू की छड़ी नहीं है जो रातोंरात सब ठीक कर दे। यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें धैर्य, मेहनत और पूरा सहयोग चाहिए।

भारत में थेरेपी की स्थिति | World Occupational Day

भारत में ऑक्यूपेशनल थेरेपी अभी भी विकासशील अवस्था में है। रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार पूरे देश में दस से बारह हजार रजिस्टर्ड ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट हैं। हर साल लगभग डेढ़ से दो हजार बीओटी ग्रेजुएट निकलते हैं। लेकिन भारत में लगभग दो से तीन करोड़ लोगों को इस थेरेपी की जरूरत है। इनमें से चालीस फीसदी बच्चे हैं जिनकी उम्र अठारह साल से कम है। पैंतीस फीसदी वयस्क हैं जिनकी उम्र अठारह से साठ साल के बीच है। पच्चीस फीसदी बुजुर्ग हैं जिनकी उम्र साठ साल से ऊपर है।

सबसे आम मामले सेरेब्रल पाल्सी के हैं जो कुल मामलों का पच्चीस फीसदी हैं। फिर स्ट्रोक के मामले आते हैं जो बीस फीसदी हैं। ऑटिज्म के मामले पंद्रह फीसदी हैं। एडीएचडी यानी ध्यान की कमी और अतिसक्रियता की समस्या वाले बच्चे दस फीसदी हैं। चोट या एक्सीडेंट के मामले पंद्रह फीसदी हैं और बाकी पंद्रह फीसदी अन्य समस्याएं हैं। दुनिया भर में लगभग छह लाख ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट हैं। अमेरिका में एक लाख तीस हजार से ज्यादा हैं, ब्रिटेन में पैंतीस हजार हैं और ऑस्ट्रेलिया में अठारह हजार हैं। इससे पता चलता है कि भारत में इस क्षेत्र में अभी बहुत काम करने की जरूरत है।

खतरनाक सच्चाई सामने आई | World Occupational Day

अब आते हैं उस गंभीर मुद्दे पर जो इस पूरे लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। लखनऊ के द होप रिहैबिलिटेशन एंड लर्निंग सेंटर के मैनेजिंग डायरेक्टर ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनका कहना है कि उनके पास रोज ऐसे लोगों के सीवी आते हैं जो या तो बीएड या एमएड स्पेशल एजुकेशन हैं, या डिप्लोमा क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट हैं, या फिर डीएचएलएस स्पीच थेरेपिस्ट हैं। ये सभी अपनी-अपनी फील्ड में योग्य हैं, लेकिन रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया की गाइडलाइंस के तहत इन सभी को स्ट्रिक्टली इंडिपेंडेंट प्रैक्टिस प्रोहिबिटेड है, यानी इन्हें अपने-अपने क्षेत्र में ही काम करना चाहिए, ऑक्यूपेशनल थेरेपी नहीं करनी चाहिए।

लेकिन द होप सेंटर के मैनेजिंग डायरेक्टर बताते हैं कि ये लोग धड़ल्ले से प्रैक्टिस ही नहीं कर रहे, बल्कि खुद को ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट बताते हैं। और इस तरह से मरीजों को बिना डिग्री होल्डर द्वारा ऑक्यूपेशनल थेरेपी दिलवाकर गुमराह किया जाता है और उनका कीमती समय बर्बाद किया जाता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब इनसे पूछा जाता है कि आप ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट कैसे हैं, तो ये बोलते हैं कि मुझे तीन साल का ऑक्यूपेशनल थेरेपी एक्सपीरियंस है किसी दूसरे सेंटर में, या दो साल का है, या एक साल का है। लेकिन सच्चाई यह है कि बिना बीओटी डिग्री के कोई भी व्यक्ति ऑक्यूपेशनल थेरेपी नहीं कर सकता, चाहे उसके पास दस साल का एक्सपीरियंस ही क्यों न हो।

Fake Vector Art, Icons, and Graphics for Free Download

क्यों खतरनाक है यह धोखाधड़ी | World Occupational Day

यह धोखाधड़ी कई स्तरों पर बेहद खतरनाक है। पहली बात तो यह है कि ऑक्यूपेशनल थेरेपी एक साइंटिफिक प्रोसेस है जिसके लिए साढ़े चार साल की स्पेशलाइज़्ड ट्रेनिंग चाहिए। इसमें एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, साइकोलॉजी, बायोमैकेनिक्स और कई दूसरे विषय पढ़ाए जाते हैं। फिर प्रैक्टिकल ट्रेनिंग होती है कि किस तरह के मरीज के लिए कौन सी टेक्निक इस्तेमाल करनी है। बिना इस ट्रेनिंग के अगर कोई व्यक्ति अपने हिसाब से थेरेपी करता है, तो वह गलत टेक्निक इस्तेमाल कर सकता है। इससे मरीज या बच्चे की हालत सुधरने के बजाय और खराब हो सकती है।

दूसरी बड़ी समस्या समय की बर्बादी है। खासकर बच्चों में अर्ली इंटरवेंशन यानी जल्दी इलाज शुरू करना बहुत जरूरी है। जीरो से छह साल की उम्र बच्चे के विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवधि होती है। अगर इस दौरान सही थेरेपी मिल जाए तो बच्चे में बहुत सुधार आ सकता है। लेकिन अगर गलत थेरेपिस्ट के पास एक-दो साल बर्बाद हो गए, तो वह कीमती समय वापस नहीं आता। माता-पिता को बाद में पता चलता है कि कोई सुधार नहीं हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। तीसरी समस्या पैसों की बर्बादी है। माता-पिता अपने बच्चे के इलाज के लिए हजारों-लाखों रुपए खर्च कर देते हैं। कई बार तो वे कर्ज भी ले लेते हैं। लेकिन अगर सही थेरेपी न मिले तो सारा पैसा बेकार चला जाता है।

सबसे बड़ा नुकसान भावनात्मक होता है। जब माता-पिता अपने बच्चे को थेरेपी के लिए लेकर जाते हैं तो उन्हें बहुत उम्मीद होती है कि उनका बच्चा ठीक हो जाएगा। वे पूरे मन से मेहनत करते हैं, हर दिन सेंटर जाते हैं, घर पर भी एक्सरसाइज कराते हैं। लेकिन जब महीनों बीत जाते हैं और कोई सुधार नहीं दिखता, तो वे टूट जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद उनके बच्चे में कोई सुधार हो ही नहीं सकता। लेकिन असलियत यह होती है कि उन्हें सही थेरेपिस्ट ही नहीं मिला था। अगर शुरू से ही सही और योग्य थेरेपिस्ट मिल जाता तो शायद उनका बच्चा बेहतर हो सकता था।

आरसीआई की गाइडलाइंस बिल्कुल साफ हैं | World Occupational Day

रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया एक्ट 1992 में साफ-साफ लिखा है कि कौन क्या कर सकता है और कौन क्या नहीं कर सकता। केवल बीओटी या एमओटी डिग्री होल्डर ही ऑक्यूपेशनल थेरेपी प्रैक्टिस कर सकते हैं। और वह भी तभी जब उनका आरसीआई रजिस्ट्रेशन हो। स्पेशल एजुकेटर्स ऑक्यूपेशनल थेरेपी नहीं कर सकते। वे केवल एजुकेशनल इंटरवेंशन कर सकते हैं, यानी बच्चे को पढ़ाई में मदद कर सकते हैं, लेकिन थेरेपी नहीं दे सकते। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट केवल साइकोलॉजिकल असेसमेंट और काउंसलिंग कर सकते हैं, लेकिन ऑक्यूपेशनल थेरेपी नहीं कर सकते।

स्पीच थेरेपिस्ट केवल स्पीच और लैंग्वेज थेरेपी कर सकते हैं, यानी बोलने और भाषा की समस्या में मदद कर सकते हैं, लेकिन ऑक्यूपेशनल थेरेपी नहीं कर सकते। कोई भी सर्टिफिकेट या डिप्लोमा कोर्स ऑक्यूपेशनल थेरेपी प्रैक्टिस के लिए मान्य नहीं है। चाहे किसी ने छह महीने का कोर्स किया हो या एक साल का, वह ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट नहीं बन सकता। यह नियम बहुत सख्त है और इसमें कोई लचीलापन नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से जमीनी स्तर पर ये नियम तोड़े जा रहे हैं और मरीजों को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।

e-Registration Portal

मरीजों को कैसे पहचानें असली थेरेपिस्ट | World Occupational Day

अब सवाल यह है कि आम लोग कैसे पता लगाएं कि जो व्यक्ति अपने को ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट बता रहा है वह सच में योग्य है या नहीं। इसके लिए कुछ आसान तरीके हैं। पहली बात तो यह है कि जब भी आप किसी थेरेपिस्ट के पास जाएं तो सबसे पहले उससे उसकी योग्यता के बारे में पूछें। पूछिए कि आपकी क्वालिफिकेशन क्या है। अगर वह कहता है कि मैंने बीओटी या एमओटी किया है, तो अच्छी बात है। लेकिन अगर वह कोई दूसरा कोर्स बताता है या घुमा-फिराकर जवाब देता है, तो सावधान हो जाइए।

दूसरी बात, उससे पूछिए कि आपने कहां से बीओटी किया है। कौन से कॉलेज का नाम लीजिए। फिर आप घर आकर इंटरनेट पर चेक कर सकते हैं कि वह कॉलेज आरसीआई अप्रूव्ड है या नहीं। तीसरी बात, हर ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को आरसीआई रजिस्ट्रेशन नंबर होना चाहिए। आप उससे यह नंबर मांग सकते हैं और आरसीआई की वेबसाइट पर जाकर वेरीफाई कर सकते हैं कि यह नंबर सही है या नहीं। चौथी बात, थेरेपिस्ट से कहिए कि आप उसकी डिग्री और मार्कशीट देखना चाहते हैं। किसी भी योग्य थेरेपिस्ट को अपनी डिग्री दिखाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अगर वह टालमटोल करता है तो समझ जाइए कि कुछ गड़बड़ है।

पांचवीं बात, अच्छे सेंटर्स में सभी थेरेपिस्टों की क्वालिफिकेशन सर्टिफिकेट दीवार पर लगे होते हैं। अगर किसी सेंटर में ऐसा नहीं है तो पूछिए क्यों नहीं है। छठी बात, अगर कोई एक ही व्यक्ति सब कुछ कर रहा है, यानी ऑक्यूपेशनल थेरेपी भी, स्पीच थेरेपी भी, स्पेशल एजुकेशन भी, तो यह संभव नहीं है। हर फील्ड के लिए अलग योग्यता चाहिए। सातवीं बात, अगर फीस बहुत कम है, असामान्य रूप से कम है, तो भी सतर्क हो जाइए। बहुत सस्ती फीस का मतलब हो सकता है कि वहां योग्य थेरेपिस्ट नहीं है।

आठवीं बात, असली ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट हमेशा पहले प्रॉपर असेसमेंट करता है। वह बच्चे या मरीज को देखता है, टेस्ट करता है, फिर एक प्लान बनाता है। अगर कोई बिना असेसमेंट के तुरंत थेरेपी शुरू कर देता है तो यह गलत है। नौवीं बात, हर महीने या हर तीन महीने में आपको लिखित प्रोग्रेस रिपोर्ट मिलनी चाहिए कि बच्चे या मरीज में क्या-क्या सुधार हुआ है। अगर सिर्फ मौखिक जवाब मिल रहे हैं तो सवाल उठाइए। दसवीं बात, असली थेरेपिस्ट हमेशा होम एक्सरसाइज प्रोग्राम देता है। अगर सिर्फ सेंटर में थेरेपी हो रही है और घर पर करने के लिए कुछ नहीं बताया जा रहा तो यह सही नहीं है।

अगर धोखाधड़ी का पता चले तो क्या करें | World Occupational Day

अगर आपको किसी फर्जी ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट का पता चलता है तो आप आरसीआई में शिकायत कर सकते हैं। आरसीआई का हेल्पलाइन नंबर है शून्य एक एक माइनस दो छह आठ पांच चार नौ दो तीन और दो छह आठ पांच शून्य नौ एक पांच। आप ईमेल भी कर सकते हैं डायरेक्टर माइनस आरसीआई ऐट निक डॉट इन पर। आरसीआई की वेबसाइट है डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट रिहैबकाउंसिल डॉट निक डॉट इन। आप चाहें तो लिखित शिकायत भी भेज सकते हैं रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया, बी माइनस बाईस, कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली माइनस एक सौ दस शून्य सोलह के पते पर।

अगर तीन से छह महीने की थेरेपी के बाद भी कोई सुधार नहीं दिख रहा है तो किसी बड़े अस्पताल में सेकंड ओपिनियन जरूर लीजिए। हो सकता है कि थेरेपिस्ट योग्य न हो या फिर थेरेपी का तरीका सही न हो। इसलिए किसी दूसरे एक्सपर्ट से राय लेना जरूरी है। सबसे जरूरी बात यह है कि आपको हमेशा याद रखना चाहिए कि एक्सपीरियंस क्वालिफिकेशन नहीं है। बीओटी डिग्री क्वालिफिकेशन है। चाहे किसी के पास दस साल का एक्सपीरियंस हो, लेकिन अगर उसके पास बीओटी डिग्री नहीं है तो वह ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट नहीं है और उसे यह काम करने का कोई अधिकार नहीं है।

द होप सेंटर की मुहिम | World Occupational Day

द होप रिहैबिलिटेशन एंड लर्निंग सेंटर, लखनऊ इस दिशा में बहुत अच्छा काम कर रहा है। यह सेंटर न केवल सही और वैज्ञानिक तरीके से थेरेपी देता है, बल्कि लोगों को जागरूक भी करता है। सेंटर में सभी स्टाफ आरसीआई रजिस्टर्ड हैं, यानी सभी थेरेपिस्टों के पास सही डिग्री और रजिस्ट्रेशन है। सेंटर में पारदर्शिता है, यानी सभी क्वालिफिकेशन सर्टिफिकेट दीवार पर लगे हुए हैं ताकि कोई भी देख सके। हर बच्चे या मरीज का डिटेल्ड असेसमेंट किया जाता है। नियमित प्रोग्रेस रिपोर्ट दी जाती है। माता-पिता को घर पर क्या करना है यह सिखाया जाता है। और सबसे अच्छी बात यह है कि जरूरतमंद परिवारों के लिए सब्सिडी भी उपलब्ध है।

द होप सेंटर के मैनेजिंग डायरेक्टर का कहना है कि हमारा उद्देश्य सिर्फ इलाज नहीं है, बल्कि सही और वैज्ञानिक तरीके से इलाज देना है। हम चाहते हैं कि कोई भी परिवार गलत लोगों के हाथों अपना समय, पैसा और उम्मीद न खोए। ऑक्यूपेशनल थेरेपी एक गंभीर मेडिकल प्रोफेशन है। इसके लिए साढ़े चार साल की रिगोरस ट्रेनिंग चाहिए। कोई भी व्यक्ति सिर्फ देखा-देखी या एक्सपीरियंस से ऑक्यूपेशनल थेरेपी नहीं कर सकता। हम सभी माता-पिता से अपील करते हैं कि अपने बच्चे का भविष्य किसी अनाड़ी के हाथ में न दें। हमेशा क्वालिफाइड और रजिस्टर्ड थेरेपिस्ट से ही इलाज कराएं।

सरकार को भी करने होंगे ये काम | World Occupational Day

इस समस्या को हल करने के लिए सिर्फ लोगों की जागरूकता काफी नहीं है। सरकार को भी सख्त कदम उठाने होंगे। पहली बात तो यह है कि फर्जी ऑक्यूपेशनल थेरेपी प्रैक्टिस करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। उन पर जुर्माना लगना चाहिए और उनका लाइसेंस कैंसिल होना चाहिए। दूसरी बात, ऑक्यूपेशनल थेरेपी सेंटर्स का नियमित निरीक्षण होना चाहिए। सरकार को टीमें बनानी चाहिए जो जाकर चेक करें कि वहां सब कुछ सही तरीके से चल रहा है या नहीं। तीसरी बात, पब्लिक अवेयरनेस कैंपेन चलाने चाहिए। टीवी, रेडियो, अखबारों में विज्ञापन आने चाहिए कि लोगों को कैसे पता करना है कि थेरेपिस्ट असली है या नकली।

चौथी बात, देश में और ज्यादा सरकारी ऑक्यूपेशनल थेरेपी कॉलेज खोलने चाहिए ताकि ज्यादा लोग यह कोर्स कर सकें और देश में योग्य थेरेपिस्टों की कमी पूरी हो सके। पांचवीं बात, गरीब परिवारों के लिए ऑक्यूपेशनल थेरेपी में सब्सिडी देनी चाहिए। अभी यह थेरेपी बहुत महंगी है और बहुत से परिवार इसका खर्च नहीं उठा सकते। छठी बात, हेल्थ इंश्योरेंस में ऑक्यूपेशनल थेरेपी को शामिल करना चाहिए ताकि लोगों को इलाज के पैसों की चिंता न करनी पड़े। सातवीं बात, आरसीआई रजिस्ट्रेशन को ऑनलाइन रियल-टाइम वेरीफाई करने की सुविधा होनी चाहिए। अभी कोई व्यक्ति अगर चेक करना चाहे तो उसे बहुत मुश्किल होती है। एक आसान ऐप या वेबसाइट होनी चाहिए जहां नंबर डालते ही पता चल जाए कि थेरेपिस्ट असली है या नकली।

याद रखने वाली जरूरी बातें | World Occupational Day

इस पूरे लेख को पढ़ने के बाद कुछ बातें आपको हमेशा याद रखनी चाहिए। पहली बात, बीओटी या एमओटी डिग्री अनिवार्य है। बिना इसके कोई ऑक्यूपेशनल थेरेपी नहीं कर सकता। दूसरी बात, आरसीआई रजिस्ट्रेशन जरूरी है। हर थेरेपिस्ट के पास यह होना चाहिए। तीसरी बात, स्पेशल एजुकेटर ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट नहीं होता। चौथी बात, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट नहीं होता। पांचवीं बात, स्पीच थेरेपिस्ट ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट नहीं होता। छठी बात, एक्सपीरियंस डिग्री की जगह नहीं ले सकता।

आपका अधिकार है कि आपको योग्य थेरेपिस्ट से इलाज मिले। आपका अधिकार है कि आप क्वालिफिकेशन वेरीफाई कर सकें। आपका अधिकार है कि आपको प्रोग्रेस रिपोर्ट मिले। आपका अधिकार है कि आप सवाल पूछ सकें। और अगर कुछ गलत हो रहा है तो आपका अधिकार है कि आप शिकायत कर सकें। इन अधिकारों का इस्तेमाल करना आपकी जिम्मेदारी है। इस विश्व व्यावसायिक उपचार दिवस पर आइए संकल्प लें कि हम सही और क्वालिफाइड ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्टों का सम्मान करेंगे। हम फर्जी प्रैक्टिशनर्स के खिलाफ आवाज उठाएंगे। हम दूसरों को भी जागरूक करेंगे। और हम अपने प्रियजनों का इलाज सिर्फ क्वालिफाइड प्रोफेशनल्स से ही कराएंगे। ऑक्यूपेशनल थेरेपी एक बहुत अच्छा और जरूरी इलाज है, लेकिन यह तभी कारगर है जब सही व्यक्ति करे। गलत हाथों में यह खतरनाक भी हो सकता है।

इस मौके पर हम उन सभी असली और योग्य ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्टों को दिल से धन्यवाद देते हैं जो अपनी मेहनत, लगन और संवेदनशीलता से हजारों लोगों की जिंदगी बदल रहे हैं। आपके कारण बच्चे फिर से मुस्कुरा रहे हैं, बुजुर्ग फिर से चल रहे हैं, और मरीज फिर से अपनी जिंदगी जी रहे हैं। लेकिन साथ ही हम उन फर्जी लोगों को भी चेतावनी देते हैं जो बिना योग्यता के लोगों के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं। यह अपराध है और इसकी सजा मिलनी चाहिए। विश्व व्यावसायिक उपचार दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। सही ऑक्यूपेशनल थेरेपी, सही इलाज, सही जिंदगी।

 

  • -द होप रिहैबिलिटेशन एंड लर्निंग सेंटर, लखनऊ

  • -आरसीआई हेल्पलाइन: 011-26854923

  • -आरसीआई वेबसाइट: www.rehabcouncil.nic.in

 

नोट: यह लेख शैक्षिक और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए कृपया योग्य डॉक्टर से परामर्श लें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *