राजकोट की हार: भारतीय क्रिकेट के सामने खड़े सवाल

राजकोट की हार: भारतीय क्रिकेट के सामने खड़े सवाल

Hind Decoder Sports Desk: राजकोट की शाम ने भारतीय क्रिकेट के कई छुपे घावों को फिर से हरा कर दिया। 284 रन का स्कोर बुरा नहीं था, लेकिन जिस तरह से न्यूज़ीलैंड ने इसका पीछा किया, वो भारतीय टीम की कमज़ोरियों का आईना बन गया।

रोको की कमी और नई पीढ़ी की समस्या

सबसे बड़ा सवाल- क्या इस टीम में रोहित-कोहली जैसा मैच विनर कॉम्बो है? जवाब साफ़ है-नहीं। जब रोहित 24 पर आउट हुए और कोहली अपनी लय में नहीं थे, तो टीम की रीढ़ ही टूटती दिखी। शुभमन गिल में प्रतिभा है, लेकिन वो अभी तक वो ठहराव नहीं ला पाए जो बड़े मैचों में ज़रूरी होता है। 56 रन अच्छे हैं, लेकिन मैच जिताने वाले नहीं। श्रेयस अय्यर का 8 रन पर आउट होना, जडेजा का संघर्ष- ये सब बताते हैं कि मध्यक्रम में वो विस्फोटक क्षमता नहीं है जो दबाव की स्थिति में मैच पलट सके। राहुल ने शतक ज़रूर लगाया, लेकिन एक अकेला योद्धा कब तक लड़े?

गेंदबाज़ी में धार का अभाव

कुलदीप यादव का 82 रन देना सिर्फ़ एक बुरा दिन नहीं था- यह भारतीय स्पिन अटैक की मौजूदा हालत का सच है। जब कुलदीप फ्लॉप हो जाते हैं, तो कोई प्लान B नहीं दिखता। चहल कहाँ हैं? अक्षर पटेल क्यों नहीं?  तेज़ गेंदबाज़ों ने शुरुआत अच्छी की, लेकिन पुरानी गेंद से वो दबाव नहीं बना पाए जो ज़रूरी था। बुमराह की कमी हर मैच में खलती है। सिराज अकेले कब तक संभालेंगे? हर्षित राणा और प्रसिद्ध कृष्णा में वो X-फैक्टर नहीं दिखता जो विकेट लेने की गारंटी दे सके।

डिफेंड करने की आदत छूटती दिख रही है

सबसे चिंताजनक बात- भारतीय टीम रन डिफेंड करना भूलती जा रही है। 284 का स्कोर भारत में कभी आसान टार्गेट नहीं माना जाता था। लेकिन आज न्यूज़ीलैंड ने 2.5 ओवर बचाकर मैच जीत लिया। यह मानसिकता की कमी है या कौशल की? जब मिचेल ने कुलदीप पर हमला किया, तो कप्तान गिल के पास कोई जवाब नहीं था। फील्ड प्लेसमेंट में कोई रचनात्मकता नहीं, गेंदबाज़ी में कोई वेरिएशन नहीं। बस उम्मीद कि कोई चमत्कार हो जाए।

कंसिस्टेंसीसबसे बड़ी समस्या

एक मैच जीतते हैं, दूसरा हारते हैं – यही कहानी पिछले कुछ सालों से चल रही है। वर्ल्ड कप में भी यही हुआ था। जब रोहित-कोहली चलते हैं तो टीम जीतती है, वरना संघर्ष। यह निर्भरता कब तक चलेगी? इंदौर में निर्णायक मैच है। लेकिन सवाल यह नहीं कि सीरीज़ कौन जीतेगा। सवाल यह है कि क्या भारतीय टीम मैनेजमेंट इन कमियों को स्वीकार करेगा? क्या नई प्रतिभाओं को सही मौका मिलेगा? क्या गेंदबाज़ी अटैक में वो विविधता आएगी जो ज़रूरी है? राजकोट की हार सिर्फ़ एक मैच की हार नहीं है। यह उस ट्रांज़िशन फेज़ की झलक है जिससे भारतीय क्रिकेट गुज़र रहा है। रो-को के बाद का भारत अभी तैयार नहीं दिखता। और अगर जल्द ही इस पर काम नहीं हुआ, तो आने वाले टूर्नामेंट्स में और भी निराशा हाथ लग सकती है।

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