सौरभ और लल्लनटॉप: जब किस्सागो खुद किस्से का हिस्सा बन गया

सौरभ और लल्लनटॉप: जब किस्सागो खुद किस्से का हिस्सा बन गया

Hind Decoder Digital Desk: दोस्तों, कभी-कभी ज़िंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं जब सफलता की कहानी अचानक अलविदा की दास्तान में बदल जाती है। पिछले कुछ हफ्तों से मीडिया जगत में एक ही चर्चा है – सौरभ द्विवेदी और लल्लनटॉप का अलग होना। और अब जब धुआं थोड़ा साफ हो रहा है, तो सामने आ रही है अगली चाल – इंडियन एक्सप्रेस से जुड़ने की खबर। यह महज़ नौकरी छोड़ने की खबर नहीं है, बल्कि यह उस सवाल की कहानी है जो हर सफल इंसान के सामने कभी न कभी आता है – आप बड़े हैं या वो संस्था जिसने आपको बनाया?

शुरुआत: जब एक प्रयोग बन गया इंकलाब

साल 2016। इंडिया टुडे ग्रुप के दफ्तरों में एक नया प्रयोग शुरू होने वाला था। नाम रखा गया – लल्लनटॉप। लेकिन डर भी था कि कहीं यह देसी अंदाज़ फेल हो गया तो ‘आजतक’ की साख पर दाग न लग जाए। इसलिए इसे अलग रखा गया। और फिर आए सौरभ द्विवेदी। एक ऐसा किस्सागो जिसने बोरिंग खबरों को दिलचस्प किस्सों में बदल दिया। गली-मोहल्ले की भाषा में राजनीति, इतिहास, समाज… सब कुछ इतना सहज कि लोग खबरें नहीं, कहानियां सुन रहे थे। नतीजा? लल्लनटॉप देश का सबसे बड़ा डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म बन गया। लेकिन साथ ही एक धारणा भी बन गई – लल्लनटॉप यानी सौरभ, और सौरभ यानी लल्लनटॉप।

जब सितारा संस्था से बड़ा दिखने लगा

कहते हैं ना कि कॉर्पोरेट दुनिया में कोई भी व्यक्ति संस्था से बड़ा नहीं होता। लेकिन सौरभ की लोकप्रियता ने यह सवाल खड़ा कर दिया था। ‘भड़ास4मीडिया’ पर शिवेंद्र कुमार (जो खुद टीवी टुडे में 15 साल रहे हैं) ने अपने विस्तृत लेख में कई अंदरूनी बातों का खुलासा किया है। आइए, उन तीन प्रमुख घटनाओं को समझते हैं जो इस अलगाव का कारण बनीं:

  • पहली बात: नियमों की अनदेखी: इंडिया टुडे जैसे बड़े संस्थानों में हर संपादक को विदेश यात्रा या बाहरी कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए लिखित अनुमति लेनी होती है। शिवेंद्र के लेख के अनुसार, सौरभ अपनी बढ़ती लोकप्रियता के चलते इन नियमों को हल्के में लेने लगे थे। कॉर्पोरेट जगत में यह एक संकेत होता है – कि व्यक्ति खुद को सिस्टम से ऊपर समझने लगा है।

  • दूसरी बात: आमिर खान वाला इंटरव्यू: जब बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान लल्लनटॉप के दफ्तर आए, तो यह मीडिया जगत के लिए बड़ी खबर थी। लेकिन शिवेंद्र के मुताबिक, सौरभ ने इसे गोपनीय रखा। कॉर्पोरेट नियमों के अनुसार, इतने बड़े स्टार के आने की सूचना पूरे नेटवर्क को होनी चाहिए थी ताकि इसका व्यावसायिक लाभ उठाया जा सके। यह ‘सिनर्जी’ का उल्लंघन था।

  • तीसरी और सबसे विवादास्पद बात: ‘Does God Exist?’ डिबेट: दिसंबर 2024 में जावेद अख्तर के साथ हुई इस बहस ने आग में घी का काम किया। यह बेहद संवेदनशील विषय था और बिना प्रबंधन की अनुमति के प्रसारित कर दिया गया। नतीजा? सरकारी स्तर तक शिकायतें पहुंचीं। और इंडिया टुडे जैसे संस्थान के लिए यह जोखिम बर्दाश्त के बाहर था।

टीम के भीतर का माहौल

शिवेंद्र के लेख में एक और गंभीर आरोप है। टीम की एक सदस्या के जन्मदिन पर कथित तौर पर की गई टिप्पणी (“पैदा होकर कौन सा उपकार किया है”) अगर सच है, तो यह दर्शाता है कि सफलता के साथ-साथ सौरभ के व्यवहार में भी बदलाव आ गया था। यह मीडिया जगत का कड़वा सच है – जब कैमरे के सामने आप सबके चहेते होते हैं, लेकिन कैमरे के पीछे रिश्तों में दरार आ जाती है।

प्रबंधन का कड़ा रुख

इंडिया टुडे ग्रुप अपने सख्त अनुशासन के लिए मशहूर है। शिवेंद्र के अनुसार, सौरभ को पहले ही एडिटर के पद से हटाकर कुलदीप (तीन ताल वाले) को हेड बना दिया गया था। यह पदोन्नति नहीं, बल्कि अधिकारों में कटौती थी। और जो विदाई समारोह का वीडियो वायरल हुआ, उसमें बड़े अधिकारियों (अरुण पुरी या कली पुरी) की अनुपस्थिति साफ़ संकेत देती है कि यह अलगाव बहुत मधुर परिस्थितियों में नहीं हुआ।

अगला पड़ाव: इंडियन एक्सप्रेस का दांव

सौरभ द्विवेदी ने आधिकारिक तौर पर कहा था कि वे ‘पढ़ने-लिखने’ के लिए ब्रेक ले रहे हैं। लेकिन शिवेंद्र का दावा था कि इसकी पटकथा आमिर खान के साथ मुलाकात के वक्त ही लिख दी गई थी। और अब मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, *सौरभ द्विवेदी इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप से जुड़ने जा रहे हैं।

यह कदम कई मायनों में दिलचस्प है

क्यों है यह कदम महत्वपूर्ण? पहला,इंडियन एक्सप्रेस भारत के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में से एक है। इसकी विश्वसनीयता और पत्रकारिता की परंपरा बेमिसाल है। दूसरा, एक्सप्रेस ग्रुप अपने डिजिटल विस्तार पर काम कर रहा है। और सौरभ जैसे ‘डिजिटल स्टार’ की एंट्री इस रणनीति का हिस्सा हो सकती है। तीसरा, यह कदम साबित करता है कि सौरभ का ‘ब्रेक लेना’ सिर्फ एक रणनीति थी – असल में वे अपनी अगली बड़ी छलांग की तैयारी कर रहे थे।

इंडियन एक्सप्रेस के लिए क्या मायने रखता है यह कदम?

डिजिटल युग में पारंपरिक मीडिया घराने युवा दर्शकों तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सौरभ की किस्सागोई शैली और उनका लाखों का फैन बेस इंडियन एक्सप्रेस को वो ‘युवा कनेक्ट’ दे सकता है जिसकी तलाश है। लेकिन सवाल यह भी है – क्या इंडियन एक्सप्रेस जैसा संस्थान सौरभ को वो ‘फ्रीडम’ देगा जो वे चाहते हैं? या फिर वही ‘कॉर्पोरेट अनुशासन बनाम व्यक्तिगत ब्रांड’ का संघर्ष दोहराया जाएगा?

क्या सौरभ इस बार सीख लेंगे?

लल्लनटॉप से सीखी बात यह है कि चाहे आप कितने भी बड़े स्टार बन जाएं, संस्थागत अनुशासन से समझौता नहीं किया जा सकता। अगर सौरभ इंडियन एक्सप्रेस में इस संतुलन को साध लेते हैं – अपनी क्रिएटिविटी बरकरार रखते हुए संस्थागत मर्यादाओं का सम्मान करते हैं – तो यह उनकी करियर की सबसे बड़ी सफलता हो सकती है। लेकिन अगर वही ‘इंडिस्पेंसिबिलिटी सिंड्रोम’ दोहराया गया, तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है।

दोनों पक्ष

  • एक पक्ष कहता है: सौरभ द्विवेदी ने अपनी मेहनत से एक ब्रांड खड़ा किया। उन्होंने बोरिंग खबरों को दिलचस्प बनाया। वे ‘सेल्फ-मेड’ स्टार हैं और उन्हें कुछ स्वतंत्रता की उम्मीद रखने का हक था।

  • दूसरा पक्ष कहता है: कोई भी कंपनी – चाहे इंडिया टुडे हो या गूगल – किसी व्यक्ति को अपने सिस्टम से ऊपर नहीं होने देती। ‘इंडिस्पेंसिबिलिटी सिंड्रोम’ यानी यह सोचना कि “मेरे बिना कंपनी नहीं चलेगी”, अक्सर कड़वाहट पर खत्म होता है।

दोस्तों, यह कहानी सिर्फ सौरभ और लल्लनटॉप की नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जहां व्यक्तिगत ब्रांड (Personal Brand) और कॉर्पोरेट अनुशासन के बीच टकराव होना तय है। यह पत्रकारिता के बदलते चेहरे की कहानी है, जहां एक किस्सागो का ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंस’ उसके संस्थान की ‘कॉर्पोरेट पॉलिसी’ से टकरा गया। और अब इंडियन एक्सप्रेस के साथ शुरू होने वाला यह नया अध्याय यह तय करेगा कि सौरभ द्विवेदी ने अपनी पिछली गलतियों से सीखा है या नहीं। क्या वे ‘टैलेंट’ और ‘टीमवर्क’ के बीच संतुलन बना पाएंगे? क्या इंडियन एक्सप्रेस उन्हें वो प्लेटफॉर्म देगा जहां वे अपनी किस्सागोई को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकें? या फिर यह भी एक और ‘अधूरी कहानी’ बनकर रह जाएगी? वक्त ही बताएगा कि ‘लल्लनटॉप’ सौरभ से था, या सौरभ अब भी खुद को साबित कर सकते हैं।

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