Iran US War: यूपी में शिया सड़कों पर, लगाए ‘हर घर से हुसैनी निकलेगा’ के नारे

Iran US War: यूपी में शिया सड़कों पर, लगाए 'हर घर से हुसैनी निकलेगा' के नारे

UP News: ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत से नाराज शिया समुदाय के लोग उत्‍तर प्रदेश में सड़कों पर उतर आए हैं। लखनऊ में रविवार (01 मार्च) रात हजारों की संख्या में शिया समुदाय के लोगों ने प्रदर्शन किया। छोटा इमामबाड़ा में बड़ा इमामबाड़ा तक कैंडल मार्च निकाला। हाथों में खामेनेई का पोस्टर लेकर अमेरिका-इजराइल मुर्दाबाद के नारे लगाए। कई शहरों में अमेरिका का पुतला जलाया गया। बिजनौर और अमरोहा में भी शिया समुदाय ने जुलूस निकाला।

इससे पहले, रविवार सुबह खामेनेई की मौत की खबर मिलते ही मातम और आक्रोश का दौर शुरू हो गया। लोगों का कहना था कि हमारे रहबर खामेनेई की शहादत खाली नहीं जाएगी। ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन दिन के शोक की घोषणा की। बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि लोग अपने घरों पर काले झंडे लगाएंगे और काले कपड़े पहनेंगे। छोटा और बड़ा इमामबाड़ा 3 मार्च तक बंद रहेंगे।

प्रयागराज में हाथों में पोस्टर लेकर निकलीं महिलाएं

ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला अली खामनेई के समर्थन में प्रयागराज में हजारों लोग रविवार देर रात सड़कों पर उतर गए। दरियाबाद स्थित दरगाह हजरत अब्बास पर सैकड़ों की संख्या में जमा हुए लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई का ऐलान किया। इस दौरान बड़ी संख्या में शिया समुदाय की महिलाएं सुप्रीम लीडर की तस्वीर हाथों में लिए रहीं। औरतों ने सुप्रीम लीडर को इंसानियत का फरिश्ता बताते हुए जमकर नारेबाजी की।

शिया समुदाय के लोगों ने अमेरिका और इजरायल का पुतला फूंका। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेन्यानाहू का पुतला जलाकर गुस्से का इजहार किया। महिला और पुरुषों ने अमेरिका मुर्दाबाद, इजरायल मुर्दाबाद के साथ पाकिस्तान मुर्दाबाद के भी नारे लगाए।

एएमयू में छात्रों ने कैंडल मार्च निकाला

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद अलीगढ़ के एएमयू में नमाज-ए-जनाजा दिया। इसके बाद सैकड़ों छात्रों ने बाब-ए-सैयद गेट तक कैंडल मार्च निकाला। मोबाइल की रोशनी में प्रदर्शन किया। इस दौरान शिया-सुन्नी भाई भाई के नारे भी गूंजे। अंजुमन तंजीमुल अजा कमेटी के सचिव सैयद नादिर अब्बास नकवी ने अलीगढ़ में 40 दिन के सामूहिक शोक का ऐलान किया है।

इस अवधि के दौरान शिया समुदाय के लोग अपने घरों पर काले झंडे लगाएंगे और विभिन्न इमामबाड़ों में मजलिस व श्रद्धांजलि कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। शहर के कई इलाकों में लोगों ने अपनी दुकानें बंद रखीं।

बिजनौर में जंजीरों से खुद को पीटकर मनाया शोक

बिजनौर के नगीना में खामेनेई की मौत पर शिया समुदाय के लोगों ने रविवार रात कैंडल मार्च और जंजीर से खुद को पीटकर मातम मनाया। जुलूस में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हुई। इस दौरान नारे लगाए कि “तुम कितने हुसैनी मारोगे, हर घर से हुसैनी निकलेगा।”

कांग्रेस नेता राशिद अल्वी बोले– प्रधानमंत्री अब तक खामोश क्यों?

लखनऊ में कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा- जो भारतीय इजराइल और ईरान में हैं, उनको निकालने की जिम्मेदारी भारत सरकार की है। इजराइल में आपने भारतीयों को भेजा क्यों था? क्या आपको पता नहीं था कि क्या हालात हैं। ये दुर्भाग्यपूर्ण है इसके लिए भारत सरकार जिम्मेदार है। सवाल ये है कि देश का प्रधानमंत्री अब तक क्यों खामोश है। ईरान से हमारी पुरानी दोस्ती रही है, ईरान हर मौके पर हमारे साथ खड़ा रहा है।

लखनऊ में शिया धर्म गुरु का ऐलान– 3 दिन सारी दुकानें बंद रहेंगी

लखनऊ में खामेनेई की मौत के विरोध में प्रदर्शन और बंद के आह्वान पर शिया धार्मिक नेता यासूब अब्बास ने कहा कि तीन दिन तक सारी दुकानें बंद रहेंगी। लोगों के घरों पर काले परचम लगेंगे।

एसटी हसन बोले– जोश में होश न खोएं, अमन बनाए रखें

मुरादाबाद में समाजवादी पार्टी के नेता एसटी हसन ने शिया समुदाय द्वारा ईरानी सुप्रीम कमांडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर विरोध प्रदर्शन पर कहा कि लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। मेरी सभी से अपील है कि जोश में होश न खोएं। अमन बनाए रखें।

रविवार को शहर में दिनरात चले प्रदर्शन

अमेरिका-इजराइल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद यूपी में प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। लखनऊ में शिया समुदाय के हजारों लोग सड़क पर उतर आए। महिलाओं और पुरूषों ने रोते हुए मातम किया। खामेनेई जिंदाबाद और अमेरिका-इजराइल मुर्दाबाद के नारे लगाए। रात करीब 11:15 बजे प्रदर्शन समाप्त हुआ।

लखनऊ में प्रदर्शनों पर BJP विधायक बोले- निंदा करता हूं

लखनऊ के सरोजनीनगर से BJP विधायक राजेश्वर सिंह ने कहा है कि ईरान संबंधी किए जा रहे सभी प्रदर्शनों की निंदा करता हूं। डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा कि जब ईरान में बाल विवाह की आयु 9 वर्ष तक करने का प्रस्ताव सामने आया और उस पर तीखी बहस हुई, जब हजारों युवा छात्राएं सड़कों पर उतरीं और कठोर कार्रवाई में अनेक युवाओं की जानें गईं- तब वैश्विक मानवाधिकार की आवाजें उतनी मुखर क्यों नहीं थीं?

इसी तरह जब अफगानिस्तान में बेटियों की शिक्षा सीमित की गई, विश्वविद्यालयों के द्वार लड़कियों के लिए बंद कर दिए गए और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी घटाई गई- तब व्यापक और संगठित विरोध कहां था? मानवाधिकारों पर चयनात्मक नहीं, सिद्धांत आधारित दृष्टिकोण जरूरी है।

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