Bureaucracy: एक DM ऐसा भी, जो सिस्टम नहीं, समाधान में विश्वास करता है

Bureaucracy: एक DM ऐसा भी, जो सिस्टम नहीं, समाधान में विश्वास करता है

Bureaucracy: उत्तर प्रदश्न के शाहजहांपुर जिले में इन दिनों प्रशासन का एक अलग ही मॉडल चल रहा है। यहां का कलेक्ट्रेट इसलिए चर्चा में नहीं है कि कोई बड़ा घोटाला हुआ या कोई विवाद खड़ा हुआ। बल्कि इसलिए चर्चा में है क्योंकि यहां जिलाधिकारी (DM) का काम करने का तरीका बाकी जिलों से बिल्कुल उलट है। शाहजहांपुर के कलेक्ट्रेट में जनसुनवाई के दौरान एक अजीब सा दृश्य दिखता है। DM की बगल में 4 कुर्सियां खाली रहती हैं। वहां सिर्फ दो लोग होते हैं – एक पीड़ित, एक DM।

दूसरे जिलों में क्या होता है? वहां DM और SP औपचारिकता निभाने के लिए बैठे रहते हैं। असली काम ADM, SDM, और दूसरे अधीनस्थ अधिकारी करते हैं। फाइलें आगे-पीछे होती रहती हैं। पीड़ित के सामने बैठा अधिकारी “जांच करवाता हूं” कहकर फाइल पर एक लाइन लिख देता है। बाकी का खेल तो वही पुराना – दफ्तर के चक्कर, हफ्तों का इंतजार, और आखिर में कुछ नहीं। लेकिन शाहजहांपुर में DM खुद सुनवाई करते हैं, खुद निर्देश देते हैं, और मौखिक आदेश से ही ज्यादातर मामले तुरंत सुलझा देते हैं।

रोज 200+ लोग, लेकिन कोई मंत्री नहीं

एक सुबह 9 बजे जब एक आगंतुक कलेक्ट्रेट पहुंचा तो टोकन लगने की लंबी लाइन देखकर हैरान रह गया। पूछा – “आज कोई मंत्री जी आ रहे हैं क्या?” जवाब मिला – “अरे मैडम, यहां तो रोज ऐसा ही होता है। यहां DM साहब की जनसुनवाई इतनी कारगर है कि तहसील-ब्लॉक स्तर के मामले भी लोग सीधे यहीं लेकर आते हैं।”

आंकड़े बताते हैं:

  • – रोजाना औसतन 200-250 लोग जनसुनवाई में आते हैं

  • – एक महीने में करीब 5,000-6,000 शिकायतें सुनी जाती हैं

  • – 70% मामलों का तत्काल समाधान हो जाता है

  • – बाकी 30% में भी 7 दिन के अंदर कार्रवाई पूरी हो जाती है

एक विधवा की पेंशन, एक फोन कॉल में

जनसुनवाई में एक विधवा महिला आई। उसकी पेंशन नहीं आ रही थी। महीनों से परेशान थी। तुरंत DPO (जिला पंचायत अधिकारी) को अपने कक्ष में बुलाया। मौखिक निर्देश दिया – “तुरंत समस्या का समाधान कीजिए। और ध्यान रखिए, दोबारा किसी विधवा के साथ ऐसी समस्या मुझे न सुनाई दे।” उसी दिन शाम तक पेंशन की प्रक्रिया पूरी हो गई। अब सोचिए, अगर वहीं फाइल पर “जांच कराई जाए” लिखकर भेज दिया जाता, तो क्या होता? वही पुराना खेल – एक सप्ताह, फिर एक महीना, फिर दोबारा शिकायत, फिर वही चक्कर।

13 कागज से 3 कागज: लाल फीताशाही पर कैंची

शाहजहांपुर में बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र के लिए पहले 13 दस्तावेज लगते थे। इसका मतलब था:

  • – गरीब परिवारों को 2,000-3,000 रुपये खर्च करने पड़ते थे

  • – अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर

  • – बिचौलियों और दलालों का धंधा

DM का निर्णय- कागजों की संख्या न्यूनतम कर दी गई। अब सिर्फ 3-4 जरूरी दस्तावेज चाहिए। एक BEO (ब्लॉक शिक्षा अधिकारी) ने बताया कि इससे जो लोग सबसे ज्यादा परेशान हुए, वो हैं वे बिचौलिए जो इसी प्रक्रिया के बीच में दलाली करके कमाई करते थे।

कलम की ताकत? नहीं, जुबान की कारगरी!

हमने हमेशा सुना है – “कलम में बड़ी ताकत होती है।” लेकिन शाहजहांपुर में सीख मिलती है कि तुरंत मौखिक निर्देश कागज़ी कार्रवाई से ज्यादा असरदार हो सकते हैं।

पुरानी व्यवस्था

  • शिकायत सुनी

  • फाइल पर लिखा – “जांच कराई जाए”

  • संबंधित विभाग को भेजा

  • रिपोर्ट मांगी गई

  • हफ्तों का इंतजार

  • पीड़ित के चक्कर

  • अंत में कुछ नहीं या बहुत देर से कुछ

शाहजहांपुर का मॉडल

  • शिकायत सुनी

  • संबंधित अधिकारी को फोन/बुलाया

  • मौखिक निर्देश दिया

  • उसी दिन या अगले दिन समाधान

  • पीड़ित संतुष्ट

DM की दलील सीधी है – “जो मामले मौखिक निर्देश से हल हो सकते हैं, उनमें कलम की स्याही, कागज और अधिकारियों का समय क्यों बर्बाद करना? पीड़ित को समाधान चाहिए, आपकी लंबी प्रक्रिया नहीं।”

चेहरे याद रखने की कला

शाहजहांपुर की एक और खासियत है – अगर कोई पीड़ित दोबारा आ जाए, तो DM उसे तुरंत पहचान लेते हैं। अगर कोई दोबारा आया, मतलब पहली बार में संतोषजनक समाधान नहीं मिला। मतलब किसी अधिकारी ने लापरवाही की। अगले दिन पेशी लगती है। और वो पेशी किसी एक अधिकारी की नहीं, बल्कि उस विभाग के निचले स्तर के अधिकारी से लेकर उच्च अधिकारी तक – सब लाइन में खड़े होते हैं। यही पेशी का डर सभी अधिकारियों को पहली बार में ही पीड़ित को संतुष्ट करने के लिए मजबूर करता है।

कड़ाई और करुणा का संतुलन

जो DM जनता के साथ सख्ती से न्याय करता है, वही अपने कर्मचारियों के साथ अभिभावक की तरह पेश आता है। “DM साहब जितना प्यार जिले की जनता से करते हैं, उतना ही अपने कर्मचारी परिवार से भी। जनता के लिए भगवान हैं, तो हमारे लिए अभिभावक।” यही है असली नेतृत्व – उदारता और सख्ती का संतुलित मिश्रण।

क्यों अलग है शाहजहांपुर का मॉडल?

सीधा संवाद

  • – कोई बिचौलिया नहीं

  • – DM खुद सुनते हैं, खुद निर्देश देते हैं

तत्काल कार्रवाई

  • – फाइलों का खेल नहीं

  • – मौखिक निर्देश से तुरंत समाधान

जवाबदेही का डर

  • – दोबारा शिकायत = विभागीय पेशी

  • – यह डर पहली बार में ही काम करवा लेता है

प्रक्रिया का सरलीकरण

  • – 13 कागज से 3 कागज

  • – कम खर्च, कम समय, कम परेशानी

जनता-केंद्रित दृष्टिकोण

  • – पीड़ित को समाधान चाहिए, प्रक्रिया की लंबी कहानी नहीं

आंकड़ों में शाहजहांपुर

  • रोजाना जनसुनवाई | 50-80 लोग | 200-250 लोग |

  • तत्काल समाधान दर | 20-30% | 70% |

  • जन्म प्रमाण पत्र के लिए दस्तावेज | 13 | 3-4 |

  • औसत खर्च (जन्म प्रमाण) | ₹2,000-3,000 | ₹200-300 |

  • शिकायत निस्तारण समय | 30-60 दिन | 1-7 दिन |

बाकी जिलों के लिए सबक

शाहजहांपुर का यह मॉडल साबित करता है कि:

  • फाइलों से ज्यादा फैसले जरूरी हैं

  • प्रक्रिया नहीं, परिणाम मायने रखता है

  • DM की कुर्सी औपचारिकता के लिए नहीं, कार्रवाई के लिए है

  • जवाबदेही का डर व्यवस्था को दुरुस्त कर सकता है

  • लाल फीताशाही की जगह जनता-केंद्रित सोच चाहिए

भारत में 750 से ज्यादा जिले हैं। हर जिले में एक DM है। लेकिन शाहजहांपुर का उदाहरण बताता है कि एक DM अगर चाहे, तो सिस्टम को बदल सकता है। यह कोई चमत्कार नहीं है। न ही कोई असंभव काम। बस जरूरत है:

  • – ईमानदार इरादे की

  • – जनता के प्रति जवाबदेही की

  • – प्रक्रिया से ज्यादा परिणाम पर फोकस की

  • – अधिकारियों को जिम्मेदार बनाने की

शाहजहांपुर का यह छोटा सा प्रयोग यह संदेश देता है – नौकरशाही: एक DM ऐसा भी हो सकता है, जो सिस्टम की गुलाम नहीं, जनता का सेवक हो।*

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *