AIIMS Delhi: ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) दिल्ली के शोधकर्ताओं ने मानसिक स्वास्थ्य की जांच के क्षेत्र में एक नया तरीका विकसित किया है। स्पीच एनालिसिस तकनीक का इस्तेमाल करके डिप्रेशन के शुरुआती लक्षणों का पता लगाया जा सकता है, जो समाज में मानसिक स्वास्थ्य की जांच के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति चिंताजनक है। नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे 2015 के मुताबिक, देश की 5.3 फीसदी आबादी डिप्रेशन से पीड़ित है। दुनियाभर में यह आंकड़ा 26.4 करोड़ से ज्यादा है। आत्महत्या की बड़ी वजहों में से एक होने के बावजूद, इसकी शुरुआती पहचान और इलाज की सुविधाएं बहुत कम हैं।
शोध कैसे किया गया
एम्स दिल्ली की एडवांस्ड स्पीच हेल्थ लैब में CSR की मदद से यह निमहंस स्टडी की गई। 423 लोगों की आवाज के सैंपल और उनके बारे में जानकारी का गहराई से विश्लेषण किया गया। लोगों का ब्योरा:
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– औसत उम्र: करीब 24 साल
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– सबसे ज्यादा भागीदारी: 18-25 साल की उम्र (23 साल से कम में 75%)
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– कॉलेज स्टूडेंट्स पर खास फोकस
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– सोशल मीडिया यूजर्स में मजबूत भागीदारी
अहम नतीजे
30 यूनिवर्सिटी के 8,542 छात्रों की जांच में हैरान करने वाले नतीजे सामने आए। 31.7% छात्र मीडियम से सीरियस डिप्रेशन से जूझ रहे थे, जबकि 33.6% में मीडियम से सीरियस चिंता के लक्षण मिले। पिछले एक साल में:
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– 22.4% ने आत्महत्या की कोशिश की
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– 18.8% को जिंदगीभर आत्मघाती विचार आते रहे
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– 15 शहरों और नौ राज्यों में जांच हुई
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– 6.7% ने आत्महत्या की कोशिश की
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– 38.1% ने अपने दोस्तों को डिप्रेशन के बारे में बताया
तकनीकी विश्लेषण के पहलू
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शोध में कई भाषाई और पैरालिंग्विस्टिक मार्करों का अध्ययन किया गया:
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सुर और उच्चारण (Tone & Articulation): डिप्रेशन वाले लोगों में एक जैसी और कम रवानी वाली बोली
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भावनाओं की झलक (Emotional Resonance): आवाज में भावनाओं की कमी
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समय के साथ बदलाव (Change over time): ज्यादा देर बोलने वाले 78% लोगों में दिक्कत
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आवाज की एनर्जी (Vocal Energy): आवाज में तनाव और कोशिश की कमी
एक्सपर्ट्स की राय
एम्स साइकियाट्री डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार के मुताबिक, “आवाज का विश्लेषण डिप्रेशन की पहचान का भरोसेमंद जरिया है। यह तरीका खासतौर पर उन इलाकों में काम का है जहां मानसिक स्वास्थ्य की सेवाएं बहुत कम हैं।” अध्ययन से पता चलता है कि डिप्रेशन सोचने-समझने और व्यवहार में बदलाव के साथ-साथ बोलने के तरीके और गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। इन बदलावों में रवानी की कमी, एक जैसी आवाज, कम आवाज की कोशिश और तनाव शामिल हैं। शोध में यह भी सामने आया कि युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और डिजिटल मेंटल हेल्थ प्लेटफॉर्म पर ज्यादा एक्टिव है। हालांकि, मिडल एज ग्रुप (30 साल के बाद) में यह भागीदारी घटने लगती है, जो मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में जेनरेशन गैप को दिखाता है।
नीति और योजना के लिए सुझाव
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यह शोध भारत में मानसिक स्वास्थ्य नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य की पहल के लिए अहम सुझाव देता है:
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शुरुआती जांच: समाज में आसान और सस्ता जांच तंत्र
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सही समय पर दखल: शुरुआती पहचान से इलाज में सुधार और परेशानियों में कमी
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रेफरल सिस्टम: पहली जांच के बाद हॉस्पिटल में इलाज की व्यवस्था
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डिजिटल माध्यम: युवाओं तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया और ऐप्स का इस्तेमाल
हालांकि यह शोध उम्मीद जगाता है, इसे अस्पतालों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है। भाषा की विविधता, सांस्कृतिक संदर्भ और टेक्नोलॉजी की पहुंच जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए इस तकनीक को भारतीय परिस्थितियों के हिसाब से ढालना होगा। फिर भी, यह कदम मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल को आम लोगों तक पहुंचाने की दिशा में एक अहम पहल है, जो भारत में लंबे समय से नजरअंदाज किए गए इस क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव का संकेत देती है।

