गर्दन का दर्द हो या स्ट्रोक का असर, शरीर के लिए कितनी कारगर है न्यूरो फिजियोथेरेपी?

गर्दन का दर्द हो या स्ट्रोक का असर, शरीर के लिए कितनी कारगर है न्यूरो फिजियोथेरेपी?
  • मोबाइल की लत, घंटों बैठकर काम और घटती शारीरिक सक्रियता से युवाओं की रीढ़ और नसों पर बढ़ रहा दबाव; स्ट्रोक के बाद रिकवरी, पार्किंसन और आधुनिक रोबोटिक फिजियोथेरेपी पर डॉ. एफए खान से विशेष बातचीत

Special Interview: शरीर जब अपनी सामान्य गति खोने लगता है, तब जिंदगी की रफ्तार भी थमने लगती है। कभी गर्दन मोड़ने में परेशानी, कभी कमर से पैर तक उठता दर्द, तो कभी हाथ-पैरों का अचानक कमजोर पड़ जाना। ये केवल शारीरिक तकलीफें नहीं, बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने वाली स्थितियां हैं। आज की डिजिटल जीवनशैली ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। काम के लंबे घंटे, मोबाइल पर लगातार झुकी गर्दन और व्यायाम से दूरी ने युवाओं को भी उन समस्याओं के करीब ला दिया है, जिन्हें पहले बढ़ती उम्र से जोड़कर देखा जाता था। दूसरी ओर, स्ट्रोक और पार्किंसन जैसी बीमारियां मरीज की चलने-फिरने, संतुलन बनाने और खुद के काम करने की क्षमता को प्रभावित करती हैं।

ऐसे में सवाल सिर्फ बीमारी के इलाज का नहीं, बल्कि उस क्षमता को वापस पाने का है, जिसके सहारे व्यक्ति बिना किसी की मदद के अपनी जिंदगी जी सके। न्यूरो फिजियोथेरेपी इसी दिशा में काम करती है। क्या स्ट्रोक के बाद खोई हुई शारीरिक क्षमता वापस पाई जा सकती है? क्या सर्वाइकल और सियाटिका के बढ़ते मामलों के पीछे हमारी जीवनशैली जिम्मेदार है? आधुनिक तकनीक न्यूरो रिहेबिलिटेशन को किस तरह बदल रही है? इन्हीं महत्वपूर्ण सवालों पर डॉ. एफए खान, विशेषज्ञ न्यूरो एवं मस्कुलर डिसऑर्डर, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ से विशेष बातचीत।

डॉ. एफए खान, विशेषज्ञ न्यूरो एवं मस्कुलर डिसऑर्डर, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ

सवाल: आमतौर पर लोग फिजियोथेरेपी को दर्द से राहत पाने का तरीका समझते हैं। न्यूरो फिजियोथेरेपी इससे कितनी अलग है?

डॉ. एफए खान: फिजियोथेरेपी का क्षेत्र काफी व्यापक है। सामान्य फिजियोथेरेपी में मांसपेशियों, जोड़ों और हड्डियों से जुड़ी समस्याओं पर काम किया जाता है, जबकि न्यूरो फिजियोथेरेपी का संबंध मस्तिष्क, स्पाइनल कॉर्ड और नर्वस सिस्टम से जुड़ी परेशानियों से है। स्ट्रोक, पैरालिसिस, नसों पर दबाव, शरीर में सुन्नपन, सेंसेशन में बदलाव और मांसपेशियों की कमजोरी जैसी स्थितियों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारा प्रयास केवल दर्द कम करना नहीं, बल्कि मरीज की मूवमेंट, बैलेंस, मसल्स की ताकत और चलने-फिरने की क्षमता को बेहतर बनाना होता है, ताकि वह अपनी दैनिक गतिविधियां अधिक स्वतंत्रता से कर सके।

 

सवाल: स्ट्रोक के बाद मरीज और परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है? फिजियोथेरेपी कब शुरू करनी चाहिए?

डॉ. खान: स्ट्रोक के बाद कई मरीजों के शरीर का एक हिस्सा प्रभावित हो जाता है। उन्हें बैठने, खड़े होने, हाथ-पैर चलाने और चलने में कठिनाई होती है। इस दौरान परिवार का ध्यान मुख्य रूप से दवाओं और मेडिकल ट्रीटमेंट पर रहता है, लेकिन रिहेबिलिटेशन भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि मरीज की चिकित्सकीय स्थिति स्थिर है, तो जल्द से जल्द फिजियोथेरेपी शुरू करने की योजना बनानी चाहिए। कई मामलों में शुरुआती 24 से 48 घंटे के भीतर नियंत्रित मोबिलाइजेशन किया जा सकता है। हालांकि यह मरीज की स्थिति, ब्लड प्रेशर और अन्य चिकित्सकीय पहलुओं को देखकर तय किया जाता है। शुरुआत में प्रभावित अंगों की सुरक्षित मूवमेंट और मांसपेशियों को सक्रिय रखने पर ध्यान दिया जाता है। इसके बाद मरीज की क्षमता के अनुसार धीरे-धीरे बैठने, खड़े होने और चलने का अभ्यास कराया जाता है।

 

सवाल: स्ट्रोक के बाद शुरुआती तीन से छह महीने को रिकवरी के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

डॉ. खान: स्ट्रोक के बाद शुरुआती तीन से छह महीने रिकवरी की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान नियमित अभ्यास और फिजियोथेरेपी से मरीज की कार्यक्षमता में सुधार की संभावनाओं का बेहतर लाभ लिया जा सकता है। हालांकि यह समझना गलत होगा कि छह महीने के बाद सुधार की संभावना समाप्त हो जाती है। मरीज की स्थिति, स्ट्रोक की गंभीरता और नियमित रिहेबिलिटेशन के अनुसार आगे भी सुधार हो सकता है। सबसे जरूरी है कि मरीज और उसके परिवार को पुनर्वास के महत्व की जानकारी हो। समय पर शुरुआत और नियमितता इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।

 

सवाल: आजकल कम उम्र के लोग भी सर्वाइकल, सियाटिका और कमर दर्द की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। इसके पीछे क्या वजह है?

डॉ. खान: हमारी जीवनशैली में शारीरिक गतिविधियां काफी कम हो गई हैं। लोग घंटों लैपटॉप पर बैठकर काम करते हैं, मोबाइल का इस्तेमाल करते समय गर्दन झुकाए रखते हैं और नियमित एक्सरसाइज नहीं करते। ऐसे में पोस्टुरल बैक पेन, सर्वाइकल, सियाटिका, डिस्क बल्जिंग और नर्व कंप्रेशन जैसी समस्याएं सामने आती हैं। कई बार दर्द गर्दन या कमर से शुरू होकर हाथ या पैर तक पहुंच जाता है। झुनझुनी और सुन्नपन भी महसूस हो सकता है। समस्या यह है कि लोग शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से नहीं लेते। दर्द की दवा लेकर फिर उसी दिनचर्या में लौट जाते हैं। लंबे समय तक गलत पोस्चर, मांसपेशियों की कमजोरी और अचानक भारी वजन उठाना परेशानी बढ़ा सकता है। इसलिए दर्द को केवल दबाने के बजाय उसके कारण का पता लगाना जरूरी है।

 

सवाल: पार्किंसन के मरीजों में फिजियोथेरेपी किस तरह मदद करती है? क्या इससे उनकी चलने–फिरने की क्षमता बनाए रखने में सहायता मिलती है?

डॉ. खान: पार्किंसन में मरीज की मूवमेंट धीरे-धीरे प्रभावित हो सकती है। चलने की गति कम होना, शरीर में अकड़न, संतुलन बिगड़ना और उठने-बैठने में परेशानी जैसी दिक्कतें सामने आती हैं। ऐसे मरीजों में मसल्स स्ट्रेंथनिंग, बैलेंस ट्रेनिंग, गेट ट्रेनिंग और मूवमेंट एक्सरसाइज महत्वपूर्ण होती हैं। इनका उद्देश्य मरीज की कार्यक्षमता बनाए रखना और उसे दैनिक गतिविधियों में अधिक समय तक आत्मनिर्भर बनाए रखने में मदद करना है। इसके लिए मरीज की स्थिति के अनुसार नियमित और सुरक्षित एक्सरसाइज जरूरी है।

 

सवाल: कई बार परिवार मरीज की पूरी देखभाल करने लगता है। क्या जरूरत से ज्यादा मदद भी रिकवरी को प्रभावित कर सकती है?

डॉ. खान: परिवार का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन मरीज की क्षमता को भी समझना चाहिए। कई बार परिवार के सदस्य मरीज को खुद हाथ उठाने, पैर चलाने, बैठने या खाना खाने का अवसर नहीं देते और हर काम स्वयं करने लगते हैं। यदि मरीज किसी गतिविधि को सुरक्षित तरीके से खुद कर सकता है, तो उसे ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे उसकी सक्रियता और आत्मनिर्भरता बनाए रखने में मदद मिलती है। परिवार को मदद और मरीज को पूरी तरह निर्भर बना देने के बीच अंतर समझना होगा। हर गतिविधि मरीज की क्षमता और विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार होनी चाहिए।

 

सवाल: रोबोटिक फिजियोथेरेपी और AI जैसी तकनीकें न्यूरो रिहेबिलिटेशन में क्या बदलाव ला रही हैं?

डॉ. खान: तकनीक ने न्यूरो फिजियोथेरेपी में नए अवसर पैदा किए हैं। रोबोटिक गेट ट्रेनिंग, रोबोटिक ग्लव्स, वर्चुअल रियलिटी और AI आधारित मूवमेंट एनालिसिस जैसी तकनीकें मरीजों के पुनर्वास में सहायक हो सकती हैं। रोबोटिक सिस्टम चलने में कठिनाई वाले मरीजों को नियंत्रित तरीके से अभ्यास कराने में मदद करते हैं। AI आधारित कैमरे और सॉफ्टवेयर शरीर की मूवमेंट, एंगल और गतिविधियों का विश्लेषण कर सकते हैं। वहीं वर्चुअल रियलिटी के जरिए बैलेंस और कोऑर्डिनेशन का अभ्यास कराया जा सकता है। लेकिन तकनीक विशेषज्ञ का विकल्प नहीं है। मरीज की जरूरत के अनुसार उपचार तय करना और उसमें बदलाव करना प्रशिक्षित फिजियोथेरेपिस्ट की भूमिका है।

 

सवाल: वर्क फ्रॉम होम और स्क्रीन टाइम के दौर में लोग अपनी रीढ़ और मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?

 डॉ. खान: आज शारीरिक गतिविधियां हमारी दिनचर्या से कम होती जा रही हैं। पहले लोगों को पैदल चलना पड़ता था, लेकिन अब ज्यादातर काम बैठकर या स्क्रीन के माध्यम से हो रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि लोग अपनी दिनचर्या में मूवमेंट को शामिल करें। लंबे समय तक एक ही पोस्चर में न बैठें। नियमित वॉक करें, स्ट्रेचिंग और मसल्स स्ट्रेंथनिंग पर ध्यान दें। काम के बीच छोटे ब्रेक लें और पर्याप्त नींद लें। शरीर को सक्रिय रखना केवल फिटनेस के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाली मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं से बचाव के लिए भी जरूरी है।

 

सवाल: स्ट्रोक से बचाव के लिहाज से बीपी और शुगर को लेकर लोग कौन सी गलती करते हैं?

डॉ. खान: कई मरीज ब्लड प्रेशर या शुगर की रीडिंग सामान्य आने पर दवाएं बंद कर देते हैं। नियमित जांच भी नहीं कराते। ऐसा नहीं करना चाहिए। बीपी और शुगर का नियंत्रण लंबे समय के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाएं लेना और नियमित मॉनिटरिंग जारी रखना जरूरी है। शरीर के संकेतों को समझें, इलाज में देरी न करें…न्यूरो फिजियोथेरेपी का महत्व केवल बीमारी के बाद शुरू होने वाले उपचार तक सीमित नहीं है। यह मरीज को दोबारा सक्रिय बनाने, उसकी कार्यक्षमता सुधारने और आत्मनिर्भरता बनाए रखने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।

 

डॉ. एफए खान, विशेषज्ञ न्यूरो एवं मस्कुलर डिसऑर्डर, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ

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