Sitapur: शारदा सहायक नहर; सीतापुर की किस्मत बदलने वाला सौ साल पुराना सपना

Sitapur: शारदा सहायक नहर; सीतापुर की किस्मत बदलने वाला सौ साल पुराना सपना

Sitapur Special: जब कोई व्यक्ति हवाई जहाज से सीतापुर के ऊपर से गुजरता है, तो नीचे फैला विशाल भूगोल एक अद्भुत कहानी सुनाता है। दो चमकती हुई रेखाएं, जो दूर-दूर तक फैली हुई हैं, मानो धरती पर चांदी की धाराएं बिछा दी गई हों। ये सिर्फ नहरें नहीं हैं – ये 10 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि की जीवनरेखा हैं, जो पिछले सौ साल से चार हजार से ज्यादा गांवों को पानी दे रही हैं।

1920 का सपना: जब इंजीनियरों ने सोची एक क्रांति

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में, जब भारत अभी भी अंग्रेजी शासन के अधीन था, उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में एक बड़ी समस्या थी। यहां की उपजाऊ जमीन थी, मेहनती किसान थे, लेकिन पानी की भारी किल्लत थी। लखीमपुर खीरी, सीतापुर, हरदोई, शाहजहांपुर – ये सभी जिले बारिश के भरोसे जीते थे। कभी सूखा पड़ता, तो कभी बाढ़ आती। किसान बेबस थे। 1920 के दशक में ब्रिटिश इंजीनियरों ने एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई। उत्तराखंड की पहाड़ियों से निकलने वाली शारदा नदी में पानी की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने सोचा – अगर इस पानी को नियंत्रित तरीके से मैदानी इलाकों तक पहुंचाया जाए, तो छह लाख हेक्टेयर जमीन को हरा-भरा बनाया जा सकता है। सर्वेक्षण शुरू हुआ। टीमें पूरे इलाके में घूमीं। जमीन की ऊंचाई-निचाई नापी गई। नदियों के प्रवाह का अध्ययन हुआ। और फिर 1924 में शुरू हुआ वह काम, जो आने वाले सौ सालों में करोड़ों लोगों की जिंदगी बदल देने वाला था।

1928: जब पहली बार बहा पानी

चार साल की कड़ी मेहनत के बाद 1928 में शारदा नहर प्रणाली का निर्माण पूरा हुआ। यह कोई साधारण परियोजना नहीं थी – उस समय इस पर 5.5 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जो आज के हिसाब से हजारों करोड़ के बराबर होगा। बनबसा में शारदा नदी पर 924 मीटर लंबा एक विशाल बैराज बनाया गया। 28 विशाल गेट लगाए गए, जो नदी के पानी को नियंत्रित करते थे। यहीं से शुरू होती थी 350 किलोमीटर लंबी मुख्य शारदा नहर, जिसमें 15,000 क्यूसेक पानी बहने की क्षमता थी – यानी हर सेकंड 15,000 घन फीट पानी। लेकिन असली जादू तब हुआ जब इस मुख्य नहर से लखीमपुर खीरी में एक और नहर निकाली गई – शारदा सहायक नहर। यह 320 किलोमीटर लंबी नहर 3,000 से 4,000 क्यूसेक पानी लेकर आगे बढ़ी। और फिर शुरू हुआ एक विशाल नेटवर्क का निर्माण।

पानी का विशाल जाल: 5000 किलोमीटर की यात्रा

शारदा सहायक नहर अकेली नहीं चलती। इससे 12 से 15 बड़ी शाखा नहरें निकलती हैं। फिर इन शाखाओं से 50 से अधिक राजस्व नहरें निकलती हैं। और फिर सैकड़ों छोटी नहरें, जो सीधे खेतों तक पानी पहुंचाती हैं। अगर आप इस पूरे नेटवर्क को मिलाएं – मुख्य नहर, शारदा सहायक नहर, सभी शाखाएं और उनकी उप-शाखाएं – तो यह 5,000 किलोमीटर से अधिक लंबा है। यानी दिल्ली से कन्याकुमारी की दूरी से भी ज्यादा! इस विशाल नेटवर्क को चलाने के लिए 200 से अधिक हेड रेगुलेटर हैं, जो पानी के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। 150 से अधिक एस्केप और फॉल्स हैं, जो अतिरिक्त पानी को निकालते हैं। 100 से अधिक बड़े पुल हैं, 50 से अधिक एक्वाडक्ट्स हैं जहां नहर नदियों को पार करती है, और 300 से अधिक क्रॉस ड्रेनेज वर्क्स हैं।

आठ जिलों की जीवनरेखा

शारदा सहायक नहर प्रणाली आठ प्रमुख जिलों में फैली हुई है – लखीमपुर खीरी, सीतापुर, हरदोई, शाहजहांपुर, पीलीभीत, बरेली, बदायूं और फर्रुखाबाद। इन जिलों के 4,000 से अधिक गांवों को यह नहर प्रत्यक्ष रूप से पानी देती है। आज यह नहर प्रणाली 8 से 10 लाख हेक्टेयर जमीन को सीधे सींचती है। अप्रत्यक्ष रूप से 12 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि इससे लाभान्वित होती है। रबी के मौसम में लगभग 6 लाख हेक्टेयर और खरीफ में 4 लाख हेक्टेयर जमीन इसी पानी से हरी-भरी होती है। इसका मतलब है कि दो करोड़ से अधिक लोग – यानी पूरे ऑस्ट्रेलिया की आबादी से ज्यादा लोग – इस नहर प्रणाली पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं।

1928 से 2025: किस्मत बदलने की कहानी

1928 से पहले यह क्षेत्र क्या था? बारिश पर निर्भर, एक फसली जमीन। किसान साल में सिर्फ एक बार खेती कर पाते थे। उत्पादकता बहुत कम थी। अकाल और भुखमरी आम बात थी। लेकिन शारदा सहायक नहर ने सब कुछ बदल दिया। आज इस क्षेत्र के 60 से 70 प्रतिशत हिस्से में दोहरी या तिहरी फसल ली जाती है। गेहूं का उत्पादन तीन से चार गुना बढ़ गया है। धान का उत्पादन पांच से छह गुना बढ़ा है। और गन्ना – जो पहले यहां बोया भी नहीं जाता था – आज प्रमुख नकदी फसल बन गया है। हर साल इस क्षेत्र से 15,000 से 20,000 करोड़ रुपये का कृषि उत्पादन होता है। 20 लाख से अधिक किसान परिवारों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। और 50 लाख से अधिक लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है – मजदूरी से लेकर व्यापार, परिवहन और प्रसंस्करण तक।

पानी का हिसाबकिताब

यह नहर प्रणाली साल भर एक जैसी नहीं चलती। अप्रैल से जून तक, जब रखरखाव का काम होता है, तो पानी का प्रवाह न्यूनतम रहता है। जुलाई से सितंबर में, जब मानसून होता है, तो मध्यम प्रवाह रहता है क्योंकि बारिश से भी पानी मिल जाता है। लेकिन अक्टूबर से मार्च तक – रबी के सीजन में – नहर पूरी क्षमता से चलती है। पानी का वितरण रोस्टर सिस्टम से होता है। हर क्षेत्र को साप्ताहिक या पाक्षिक आधार पर पानी मिलता है। प्रति हेक्टेयर पानी की मात्रा पहले से तय होती है, ताकि सभी को न्याय से पानी मिले। लेकिन हर साल एक बड़ी चुनौती है – गाद। नहरों में हर साल 2 से 3 करोड़ क्यूबिक मीटर गाद जम जाती है। इसे निकालना जरूरी होता है, वरना नहर की क्षमता कम हो जाती है।

पानी की बर्बादी: एक बड़ी चुनौती

हालांकि यह नहर प्रणाली बहुत बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या भी है – पानी की बर्बादी। जो नहरें अभी भी बिना लाइनिंग की हैं, उनमें 20 से 25 प्रतिशत पानी रिसाव से बर्बाद हो जाता है। वाष्पीकरण से 5 से 8 प्रतिशत पानी और उड़ जाता है। इसीलिए 1970 के दशक से नहरों में लाइनिंग का काम शुरू हुआ। कंक्रीट की परत बिछाई गई, ताकि पानी जमीन में न रिसे। लेकिन अभी भी लगभग 1,000 किलोमीटर नहर में यह काम बाकी है।

आधुनिकीकरण की यात्रा

1970 और 1980 के दशक में बनबसा बैराज का पुनर्निर्माण हुआ। पुराने गेट बदले गए, नई संरचनाएं बनाई गईं। नहर प्रणाली को मजबूत बनाया गया। 2000 के दशक में कमांड एरिया डेवलपमेंट प्रोजेक्ट शुरू हुआ। इस पर 2,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए। SCADA सिस्टम लगाया गया – एक डिजिटल तकनीक जो पानी के प्रवाह को स्वचालित रूप से नियंत्रित करती है। माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा दिया गया। आज 1 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम लगा है, जो पानी की बचत करता है। 2020 के बाद स्मार्ट वाटर मीटरिंग शुरू हुई। सोलर पंप को प्रोत्साहन दिया गया। नहरों की डी-सिल्टिंग का काम तेज किया गया।

5000 लोगों की मेहनत

इस विशाल नहर प्रणाली को चलाने के लिए सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश के पास एक पूरा संगठन है। एक मुख्य अभियंता शारदा नहर सर्कल का नेतृत्व करते हैं। उनके नीचे 8 से 10 अधीक्षण अभियंता अलग-अलग डिवीजन संभालते हैं। 30 से अधिक कार्यकारी अभियंता सब-डिवीजन चलाते हैं। कुल मिलाकर 5,000 से अधिक कर्मचारी – तकनीकी और प्रशासनिक – इस नहर प्रणाली को दिन-रात चलाते हैं। उनकी मेहनत से ही लाखों किसानों के खेतों में पानी पहुंचता है।

किसानों से लिया जाने वाला जल कर

पानी मुफ्त नहीं है। किसानों को जल कर देना पड़ता है। यह फसल के आधार पर अलग-अलग होता है – प्रति हेक्टेयर 1,000 से 3,000 रुपये के बीच। हर साल सरकार इससे 300 से 400 करोड़ रुपये का राजस्व इकट्ठा करती है। यह पैसा नहर के रखरखाव, मरम्मत और आधुनिकीकरण में खर्च होता है। लेकिन यह काफी नहीं है – सरकार को अतिरिक्त पैसा भी लगाना पड़ता है।

भूजल पर असर: एक बोनस लाभ

शारदा सहायक नहर का एक बड़ा फायदा यह हुआ कि पूरे क्षेत्र में भूजल स्तर बढ़ गया। जहां नहर का पानी जमीन में रिसता है, वहां भूजल का स्तर 2 से 5 मीटर तक बढ़ा है। आज नहर कमांड क्षेत्र में 90 प्रतिशत से अधिक कुओं में साल भर पानी रहता है। यह एक बोनस लाभ है, जिसकी योजना बनाते समय कल्पना भी नहीं की गई थी।

हरियाली और पर्यावरण

नहरों के किनारे 10 लाख से अधिक पेड़ लगाए गए हैं। ये पेड़ न केवल हरियाली देते हैं, बल्कि मिट्टी के कटाव को भी रोकते हैं। नहरों में जलीय जीवन विकसित हुआ है। मछलियां, कछुए, और अन्य जलीय जीव पनपे हैं। पक्षियों की कई प्रजातियां नहरों के किनारे अपना बसेरा बनाती हैं। प्रवासी पक्षी सर्दियों में यहां आते हैं। पूरा पारिस्थितिकी तंत्र समृद्ध हुआ है।

भविष्य की योजनाएं: 2024 से 2030

सरकार ने अगले पांच सालों के लिए महत्वाकांक्षी योजनाएं बनाई हैं। 5,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश होगा। शेष 1,000 किलोमीटर नहर में लाइनिंग की जाएगी। स्वचालित गेट सिस्टम लगाया जाएगा। रीयल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम होगा, जिससे हर समय पता रहेगा कि कहां कितना पानी बह रहा है। लक्ष्य है कि जल हानि को 15 प्रतिशत तक कम किया जाए। परिशुद्ध कृषि (precision farming) को बढ़ावा दिया जाए। सौर ऊर्जा आधारित पंप लगाए जाएं।

एक नहर, लाखों जिंदगियां

आज जब आप सीतापुर की धरती पर खड़े होकर इन दो समानांतर नहरों को देखते हैं, तो आपको एक सदी की कहानी दिखती है। 1924 में शुरू हुआ एक सपना, जो 1928 में हकीकत बना। और फिर पिछले सौ सालों में करोड़ों लोगों की किस्मत बदल दी। शारदा सहायक नहर केवल एक इंजीनियरिंग परियोजना नहीं है। यह 10 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन की जीवनदायिनी है। यह 4,000 से अधिक गांवों की उम्मीद है। यह 2 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका है। यह 20 लाख किसान परिवारों का सहारा है। हर साल जब रबी का सीजन शुरू होता है और नहर में पानी की धारा तेज होती है, तो लाखों किसान राहत की सांस लेते हैं। उन्हें पता है कि उनके खेत हरे होंगे। उनकी फसल लहलहाएगी। उनके बच्चों को भूखे नहीं सोना पड़ेगा।

यह है शारदा सहायक नहर की असली ताकत – सिर्फ पानी नहीं, जिंदगी बहाने की ताकत। सिर्फ सिंचाई नहीं, समृद्धि लाने की ताकत। सिर्फ एक नहर नहीं, बल्कि लाखों सपनों को पूरा करने की ताकत। और जब आप हवाई जहाज से उन दो चमकती धाराओं को देखते हैं, तो आप सिर्फ पानी नहीं देख रहे होते – आप एक सदी की मेहनत, करोड़ों लोगों की आशाएं, और भारतीय इंजीनियरिंग की उत्कृष्टता देख रहे होते हैं। यही है शारदा सहायक नहर – सीतापुर और आसपास के इलाकों की असली जीवनरेखा, जो पिछले सौ सालों से बह रही है, और आने वाली सदियों तक बहती रहेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *