जस्टिस राधा बिनोद पाल: भारतीय न्यायाधीश जिसे जापान ने भगवान माना, भारत ने भुला दिया

जस्टिस राधा बिनोद पाल: भारतीय न्यायाधीश जिसे जापान ने भगवान माना, भारत ने भुला दिया

Hind Decoder International Desk: इंटरनेशनल मिलिट्री ट्रिब्यूनल फॉर द फार ईस्ट का कोर्टरूम। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के तीन साल बाद, 11 देशों के न्यायाधीश जापान के 28 शीर्ष नेताओं का भाग्य तय करने बैठे थे। प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो समेत सभी को Class-A युद्ध अपराधी घोषित किया जा चुका था। फांसी की रस्सी तैयार थी।

10 न्यायाधीशों ने एक स्वर में कहा-GUILTY! लेकिन फिर एक आवाज़ गूंजी जिसने इतिहास की धारा बदल दी NOT GUILTY! यह आवाज़ थी 62 वर्षीय भारतीय न्यायाधीश डॉ. राधा बिनोद पाल की। उस एक वाक्य ने न सिर्फ कोर्टरूम को स्तब्ध कर दिया, बल्कि “विजेताओं के न्याय” की पूरी अवधारणा को चुनौती दे दी।

गाय चराने वाला बालक जो बना विश्व न्यायाधीश

27 जनवरी 1886, पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के सलीमपुर गांव, मयमनसिंह जिला। एक अत्यंत निर्धन परिवार में राधा बिनोद का जन्म हुआ। पिता बिपिन बिहारी पाल की मृत्यु जब वे मात्र तीन वर्ष के थे। माता तारासुंदरी देवी ने अकेले ही तीन बच्चों को पाला। परिवार की आय का एकमात्र स्रोत – कुछ गायें। 8 वर्षीय राधा बिनोद गायें चराते हुए गांव के प्राइमरी स्कूल की खिड़की के बाहर खड़े होकर पढ़ाई सुनते थे। एक दिन स्कूल इंस्पेक्टर का दौरा था। अचानक इंस्पेक्टर ने कक्षा में पूछे गए प्रश्न का उत्तर खिड़की के बाहर से आता सुना। जब पता चला कि उत्तर देने वाला बालक स्कूल का छात्र नहीं है, तो इंस्पेक्टर चकित रह गए। उन्होंने तत्काल बालक को निःशुल्क शिक्षा और छात्रवृत्ति की व्यवस्था करवाई।

शैक्षणिक यात्रा के मील के पत्थर:

  • – 1905: प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता से गणित में B.A. (प्रथम श्रेणी)

  • – 1907: गणित में M.A. (स्वर्ण पदक)

  • – 1908: कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून में B.L.

  • – 1920: कलकत्ता विश्वविद्यालय से Doctor of Laws (LL.D)

  • – 1925: M.L. (Master of Laws)

टोक्यो ट्रायल: जब एक भारतीय ने पूरी दुनिया से टक्कर ली

वह 1235 पेज का ऐतिहासिक फैसला, जस्टिस पाल ने अपना Dissenting Judgment 1235 पृष्ठों में लिखा – इतिहास का सबसे लंबा असहमति नोट। उनके मुख्य तर्क:

“Ex Post Facto” कानून का उल्लंघन:”आक्रामक युद्ध” को 1945 से पहले अंतरराष्ट्रीय अपराध घोषित नहीं किया गया था। बाद में बनाए गए कानून से पहले के कृत्यों को दंडित करना न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।

परमाणु बम का प्रश्न:”यदि Pearl Harbor पर हमला युद्ध अपराध है, तो हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराना क्या है? 2,00,000 निर्दोष नागरिकों की तत्काल मृत्यु और लाखों का विकिरण से प्रभावित होना – क्या यह मानवता के विरुद्ध अपराध नहीं?”

“Victor’s Justice” की अवधारणा: “यह न्यायालय निष्पक्ष नहीं है। यह विजेताओं द्वारा पराजितों को दंडित करने का एक राजनीतिक औजार मात्र है।”

साम्राज्यवाद का दोहरा मापदंड: “यदि जापान का एशिया में विस्तार अपराध है, तो यूरोपीय शक्तियों का सदियों का उपनिवेशवाद क्या है? भारत, अफ्रीका, एशिया की गुलामी के लिए कौन सा न्यायालय है?”

वे आंकड़े जो इतिहास ने दबा दिए

  • 55 जापानी नेताओं पर मुकदमा
  • – 28 को Class-A युद्ध अपराधी घोषित किया गया
  • – 7 को मृत्युदंड (तोजो समेत)
  • – 16 को आजीवन कारावास
  • – 2 को कम अवधि की सजा
  • – 3 की ट्रायल के दौरान मृत्यु

जस्टिस पाल के फैसले के कारण कई को मृत्युदंड से बचाया जा सका।

जापान में देवता का दर्जा

  • 1966: सम्राट हिरोहितो ने उन्हें जापान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान *”Order of the Sacred Treasure”*  प्रदान किया।
  • 1974: जापान सरकार ने उनके सम्मान में विशेष स्मारक टिकट जारी किया।
  • 2005: क्योटो विश्वविद्यालय में “Radhabinod Pal Memorial Lecture Series” की स्थापना।
  • 2007: प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने भारत यात्रा के दौरान कोलकाता में उनके पुत्र से मुलाकात कर कहा – “जस्टिस पाल जापान के लिए भगवान समान हैं।”

जापान में उनकी स्मृति

टोक्यो:

  • – यासुकुनी श्राइन में स्मारक
  • – सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रतिमा
  • – “Pal-Shimonaka Memorial Hall”

क्योटो:

  • – रयोजेन गोकोकू श्राइन में स्मारक
  • – क्योटो विश्वविद्यालय में शोध केंद्र

हिरोशिमा:

  • – शांति स्मारक पार्क में उद्धरण
  • भारत की शर्मनाक उपेक्षा

जिस देश के लिए लड़े, उसी ने भुला दिया

भारत में स्थिति:

  • – कोई राष्ट्रीय सम्मान नहीं (न भारत रत्न, न पद्म पुरस्कार)
  • – इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में नाममात्र का उल्लेख
  • – कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं
  • – 99% भारतीय उनका नाम तक नहीं जानते
  • 2006: कलकत्ता हाईकोर्ट में छोटी सी प्रतिमा स्थापित (60 साल बाद!)
  • 2018: केवल पश्चिम बंगाल सरकार ने उनकी जयंती पर कार्यक्रम आयोजित किया

उनके अन्य महत्वपूर्ण योगदान

अंतरराष्ट्रीय न्यायविद् के रूप में

  • 1952-1967: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (हेग) में भारत के प्रतिनिधि
  • 1958-1962: UN International Law Commission के अध्यक्ष

पुस्तकें:

  • – “International Law in Transition” (1946)
  • – “Crimes in International Relations” (1947)
  • – “The Future of International Law” (1955)
  • – “Philosophy of International Justice” (1960)

भारतीय न्यायपालिका में योगदान

  • – 1941-1943: कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश
  • – कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति (1944-1946)
  • – भारतीय विधि आयोग के सदस्य

वे बातें जो इतिहास ने दबा दीं

  • नेताजी कनेक्शन: यदि नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया होता, तो जस्टिस पाल उनका केस निःशुल्क लड़ने को तैयार थे। उन्होंने INA के सैनिकों के पक्ष में खुलकर लिखा।
  • गांधी से असहमति: वे गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत से पूर्णतः सहमत नहीं थे। मानते थे कि अन्याय का प्रतिकार करना धर्म है।
  • चीन का विरोध: चीन आज भी उन्हें “जापानी युद्ध अपराधियों का रक्षक” मानता है। Nanjing Massacre पर उनके विचारों को लेकर विवाद है।
  • अमेरिका का दबाव: CIA के अभिलेखों के अनुसार, अमेरिका ने भारत सरकार पर जस्टिस पाल को वापस बुलाने का भारी दबाव डाला था।
  • व्यक्तिगत त्याग: टोक्यो में रहने के दौरान उन्होंने अपना पूरा वेतन युद्ध पीड़ितों के लिए दान कर दिया।

10 जनवरी 1967: जब एक युग का अंत हुआ

  • कलकत्ता में 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। जापान ने राष्ट्रीय शोक घोषित किया। टोक्यो में हजारों लोगों ने शोक सभा की। भारत में… केवल एक छोटी सी खबर।
  • आज की प्रासंगिकता
  • यूक्रेन-रूस युद्ध के संदर्भ में
  • जस्टिस पाल के सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। युद्ध अपराध की परिभाषा, निष्पक्ष न्याय की अवधारणा, और “विजेताओं के न्याय” का प्रश्न।
  • भारत की विदेश नीति में
  • “वसुधैव कुटुम्बकम” की भारतीय अवधारणा के वे सच्चे प्रतिनिधि थे। NAM की नींव में उनके विचारों का योगदान।

 

 

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