भारतीय कर प्रणाली में जीएसटी (GST) के लागू होने के बाद व्यापारिक सुगमता की दिशा में कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन इसके विधिक ढांचे में एक ऐसा ‘असंतुलन’ मौजूद है, जो सीधे तौर पर हमारे संविधान की मूल भावना को चुनौती देता है। कानपुर के मर्चेंट चैंबर हॉल में जीएसटी लिटिगेशन पर हुए विमर्श के बाद यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो गया है कि क्या वर्तमान कर व्यवस्था में ‘आर्थिक न्याय’ केवल एकतरफा है?
जीएसटी कानून की धारा 50 के तहत, यदि कोई करदाता कर के भुगतान में एक दिन की भी देरी करता है तो विभाग उससे 18% तक की दर से ब्याज वसूलता है। लेकिन विडंबना देखिए, उसी करदाता का लाखों-करोड़ों रुपया ‘इलेक्ट्रॉनिक कैश लेजर’ और ‘क्रेडिट लेजर’ में महीनों तक सरकार के पास जमा रहता है, जिस पर सरकार एक पैसे का भी ब्याज नहीं देती। यह पैसा व्यापारी की वह ‘कार्यशील पूंजी’ (Working Capital) है, जिसे उसने बाजार से ब्याज पर उठाया होता है।
संविधान की प्रस्तावना और ‘आर्थिक न्याय‘
हमारे संविधान की प्रस्तावना ‘आर्थिक न्याय’ (Economic Justice) का संकल्प लेती है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि राज्य और नागरिक के बीच ‘पारस्परिकता का सिद्धांत’ (Doctrine of Reciprocity) लागू होना चाहिए। जब राज्य देरी पर दंड लेता है, तो उसे अग्रिम या अतिरिक्त जमा राशि पर प्रतिफल (Interest) भी देना चाहिए। करदाता के धन को बिना किसी ब्याज के अवरुद्ध करना एक प्रकार का ‘राजकोषीय शोषण’ है।
मौलिक अधिकारों का हनन
यह विसंगति अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन है क्योंकि यह राज्य को करदाता की तुलना में अनुचित लाभ की स्थिति में रखती है। साथ ही, बिना ब्याज के पूंजी का ब्लॉक होना अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार करने की स्वतंत्रता पर एक ‘अनुचित प्रतिबंध’ है।
समय की मांग
जीएसटी काउंसिल और सरकार को इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा। यदि भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है, तो कर प्रणाली को केवल ‘वसूली केंद्रित’ होने के बजाय ‘न्याय केंद्रित’ होना चाहिए। क्या न्यायपालिका इस ‘संवैधानिक शून्य’ को भरने के लिए आगे आएगी? यह सवाल आज देश के हर ईमानदार करदाता के मन में है।

